
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : भागीरथपुरा में दूषित पानी से बीमारी और मौतें किसी एक अधिकारी की चूक का नतीजा नहीं थीं, बल्कि पूरी व्यवस्था ही दूषित थी। बुधवार को हाई कोर्ट की साइट पर अपलोड हुई एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने तीन दशक में तैयार हुई चूकों की पूरी श्रृंखला सामने रखी है।
सीवर और जलापूर्ति लाइनों की खामी से लेकर वर्षों तक निगरानी और रखरखाव में कमी, शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होने और पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया में हुई लंबी देरी तक। यानी पानी एक दिन में दूषित नहीं हुआ, व्यवस्था की चूकें वर्षों में जमा होती रहीं और आखिरकार इसका परिणाम बीमारी और मौतों के रूप में सामने आया।
रिपोर्ट के अनुसार भागीरथपुरा में सीवर नेटवर्क 1990 से 1995 के बीच और जलापूर्ति पाइप लाइन 1999 से 2004 के बीच बिछाई गई। जांच में सामने आया कि कई स्थानों पर दोनों नेटवर्क समानांतर चल रहे थे, कुछ जगह एक-दूसरे को पार कर रहे थे। दोनों के बीच निर्धारित दूरी भी नहीं थी। कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पानी की लाइन के ऊपर तक थी। आयोग ने इसे दूषित पानी के प्रवेश के लिए गंभीर तकनीकी जोखिम माना। यानी खतरा अचानक दिसंबर 2025 में पैदा नहीं हुआ था। उसकी जमीन पाइप लाइन बिछने के समय ही तैयार हो गई थी।
जांच में अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बयान सामने आए कि क्षेत्र में पानी की पाइप लाइन में लीकेज, खराबी और पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें होती रही थीं। आयोग ने पाया कि जलापूर्ति नेटवर्क की पर्याप्त मैपिंग, संवेदनशील स्थानों की पहचान, लीकेज की निगरानी और समय पर सुधार की व्यवस्था प्रभावी नहीं थी। रिपोर्ट ने इसे केवल तकनीकी नहीं, संस्थागत विफलता भी माना है।
पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई, लेकिन इससे पहले फाइलें और टेंडर ही लंबी प्रक्रिया में उलझते रहे। जांच आयोग ने अलग-अलग चरणों में हुई देरी को दर्ज किया है।
आयोग के आकलन में विभिन्न चरणों को मिलाकर कुल असामान्य देरी 859 दिन से अधिक रही। रिपोर्ट ने टेंडर शाखा, संबंधित इंजीनियरिंग अधिकारियों, प्रशासनिक स्तर, पर्यवेक्षण व्यवस्था और ठेकेदार की भूमिका को अलग-अलग देखा है।
दूसरे टेंडर में वित्तीय बोली 22 अगस्त 2024 को खोली गई। इसके बाद दोबारा टेंडर की सिफारिश 26 दिसंबर 2024 को हुई। यानी निर्णय की प्रक्रिया में करीब 126 दिन लगे।
तीसरे टेंडर की प्रक्रिया में भी गति नहीं आई। तकनीकी और वित्तीय बोली की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मामला टेंडर समिति के सामने रखने में करीब 94 दिन लगे।
निष्कर्ष: तीन टेंडर, सैकड़ों दिन की प्रक्रिया और जनवरी 2026 में जाकर बदली पाइप लाइन, जबकि पहला काम मई 2024 तक पूरा होना था।
जांच आयोग को पुराने सीवर और जलापूर्ति नेटवर्क के मूल नक्शे, वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका, निरीक्षण रिकॉर्ड, पूर्णता प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराए जा सके। आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड की अनुपलब्धता ने यह तय करना कठिन बना दिया कि मूल निर्माण में किस स्तर पर क्या चूक हुई थी।
जांच आयोग ने तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान कलेक्टर शिवम वर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान में एमडी पर्यटन दिलीप यादव, तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान में सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल को जांच रिपोर्ट में क्लीनचीट दे दी है।
इसके अलावा तत्कालीन अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा और अपर आयुक्त सिद्धार्थ जैन और अभिषेक गेहलोत को भी क्लीनचीट मिली है। रिपोर्ट में कहा है कि इन सभी के समय में पानी की लाइन बिछाने के काम में कोई देरी सामने नहीं आई। आयोग ने महापौर और महापौर परिषद को भी क्लीनचीट दी है।
तत्कालीन अपर आयुक्त भव्या मित्तल और रोहित सिसोनिया को लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। आयोग ने पाया कि तत्कालीन नर्मदा प्रोजेक्ट प्रभारी एक्जीक्यूटीव इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव ने इस पूरे मामले में गंभीर लापरवाही की।
रिपोर्ट में कहा है कि भागीरथपुरा के लिए टेंडर के संबंध में 15 अक्टूबर 2025 को रोहित सिसोनिया ने संजीव श्रीवास्तव को लिख दिया था कि इसमें चर्चा कीजिए, लेकिन यह चर्चा 26 दिसंबर को यानी 72 दिन देरी से की गई। संजीव श्रीवास्तव ने अनावश्यक देरी की जबकि रोहित सिसोनिया ने इसकी निगरानी ही नहीं की। इसी तरह भव्या मित्तल के समय में भी टेंडर फाइल में देरी की गई।
आयोग ने दूषित पानी की वजह से मृत लोगों के स्वजन को 10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप मेंं दिए जाने की अनुशंसा की है। फिलहाल मृतकों के स्वजन को रेडक्रास सोसायटी के माध्यम से दो-दो लाख रुपये की राहत राशि दी गई है।