
लोकेश सोलंकी, नईदुनिया, इंदौर : आलू की चाट-पकोड़ों को सुनहरा पीला बनाने के लिए हल्दी नहीं टारट्राजीन नामक कृत्रिम रंग डाला जा रहा है। तंदूरी वेज-नानवेज टिक्कों से लेकर मंचूरियन-मोमोस के मेरिनेशन की लाल रंगत काश्मीरी मिर्च से नहीं बल्कि उजोरुबीन नामक रंग से आ रही है।
इतना ही नहीं रंगों से लुभाते फिंगर-फ्रायम्स और गुड़िया के बाल (कॉटन केंडी) में तो रोडामाइन-बी जैसे औद्योगिक रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है। देश के कई प्रदेशों में दो साल से खाद्य पदार्थों में हानिकारक रंगों के उपयोग के खिलाफ सख्ती शुरू हो गई है। इसके उलट मप्र में रंगों की मिलावट पर कार्रवाई के लिए सरकारी आदेश का इंतजार किया जा रहा है।
दक्षिण के राज्यों में दो साल पहले ही गुड़िया के बाल (काटन केंडी) में रंगों के इस्तेमाल के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो चुकी है। इसके बाद महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में भी सख्ती हुई। तमाम राज्य लाल रंग से रंगे जा रहे मंचूरियन से लेकर कबाब और रंगीन फ्रायम्स की बिक्री भी प्रतिबंधित कर चुके हैं।
मप्र का हाल इसके बिल्कुल उलट है। कृत्रिम रंगों का लापरवाह इस्तेमाल काटन केंडी से आगे बढ़कर अब स्ट्रीट फूड में आम हो गया है। महीनेभर से मप्र का खाद्य व औषधी प्रशासन विभाग डेयरी उत्पादों और अन्य तरह के खाद्य पदार्थों में मिलावट के खिलाफ अभियान चला रहा है, लेकिन स्ट्रीट फूड से लेकर बेकरी-नमकीन तक फैली हानिकारक कृत्रिम रंगों की मिलावट पर उसका ध्यान नहीं है।
एफएसएसआई के अधिकारी बता रहे हैं कि खाद्य पदार्थों में कृत्रिम रंगों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर रोक है। तमाम प्रदेशों में कार्रवाई हुई क्योंकि वहां के कमिश्नरों ने आदेश जारी किया। जब तक प्रदेश में कमिश्नर एफएसएसआइ ने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया इसलिए रंगों से भरे खाद्य पदार्थों की बिक्री जारी है।
केमेस्ट्री के प्रोफेसर और वर्ल्ड रिसर्चर्स एसोसिएशन के संस्थापक डॉ. एसएल गर्ग के अनुसार रोडामाइन जैसे रंग असल में औद्योगिक रंजक (डाई) होते हैं।उजोरुबीन, कारमोइजिन आइएनएस 110, 122 जैसे कोड नेम से बिकने वाले खाद्य रंग भी कैमिकल से बने होते हैं। अमेरिका जैसे देश में तो खाद्य और कास्मेटिक में ऐसे रंगों के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध है।तमाम शोध कहते हैं कि इन रंगों के ज्यादा सेवन से पेट के रोग, एलर्जी, बच्चों में हाइपरएक्टिवनेस के लक्षण सामने आते हैं। साथ ही साथ लंबे समय तक कृत्रिम रंग भोजन के साथ पेट में जाने से केंसर का खतरा भी बना रहता है। क्योंकि कृत्रिम रंगों में लेड और आर्सेनिक जैसे हेवी मैटल्स होते हैं।
खाद्य पदार्थों में कृत्रिम नियम पर एफएसएसआई ने कड़े नियम बनाए हैं। बिना स्पष्ट नियम अनुमति के किसी भी खाद्य पदार्थ में बाहरी कृत्रिम रंग नहीं मिलाया जा सकता। मेनकोर्स व्यंजन जैसे चाट-पकोड़ी, चटनी, सास, दाल या सब्जियों आदि में तो किसी भी तरह के कृत्रिम रंग का इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता। कन्फेक्शनरी और पेय पदार्थ (पैक्ड) में सीमित रंगों की अनुमति दी गई है जो 100पीपीएम से ज्यादा नहीं हो सकती।
कुछ साल पहले हमने कॉटन केंडी में रंग मिलाने के खिलाफ कार्रवाई कर जब्त किया था। अन्य पदार्थों के सैंपल जब जांचे जाते हैं तो उनमें रंगों की जांच भी होती है। चाट-चौपाटी, परंपरागत व्यंजन-भोजन में तो रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अन्य प्रदेशों में लोकल अथारिटी के आदेश पर कार्रवाई हुई। अपने यहां अभी ऐसे आदेश जारी नहीं हुए हैं।आम लोगों को भी इसके प्रति जागरूक होना पड़ेगा। -मनीष स्वामी, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी