
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। करीब एक हजार साल पुराने इतिहास, धार्मिक दावों, पुरातात्विक साक्ष्यों और कानूनी बहस के केंद्र में भोजशाला (Bhojshala Dispute) और उससे जुड़े विवाद रहे हैं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में हुई सुनवाई में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट, संस्कृत के शिलालेख, स्थापत्य अवशेष, वाग्देवी प्रतिमा और पूजा-नमाज व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे बनकर चर्चित रहे।
वर्षों पुराने इस विवाद में इतिहास, आस्था, पुरातत्व और कानून के जटिल सवाल कोर्ट के सामने आए। विवाद और उसकी जड़ भोजशाला को हिंदू पक्ष मां सरस्वती (वाग्देवी) का प्राचीन मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा। यही दो दावे दशकों से विवाद की जड़ बने रहे।
हाई कोर्ट के हालिया निर्णय तक परिसर एएसआई के नियंत्रण में संरक्षित स्मारक के रूप में है। तय व्यवस्था के अनुसार यहां अलग-अलग दिनों में पूजा और नमाज होती है। विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा का मुद्दा भी प्रमुख है। रिकार्ड के अनुसार वर्ष 1875 में खोदाई के दौरान प्रतिमा मिलने का उल्लेख है।
बाद में ब्रिटिश अधिकारी इसे इंग्लैंड ले गए। हिंदू संगठनों ने कई बार प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग उठाई।
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वर्ष 2003 में लागू व्यवस्था के तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई। जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते हैं, तब विवाद और तनाव की स्थिति बनती रही है। वर्ष 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और भोज उत्सव समिति से जुड़े पक्षकारों ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर परिसर के मूल स्वरूप की वैज्ञानिक जांच की मांग की। याचिका में धार्मिक अधिकार तय करने की मांग भी शामिल थी।

भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किए गए सर्वे की 2000 से अधिक पेज की रिपोर्ट में परिसर में मंदिर शैली के अवशेष, मूर्तियां, स्तंभ, शिलालेख और स्थापत्य सामग्री मिलने का उल्लेख है। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान ढांचे में पूर्ववर्ती संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग हुआ।
सर्वे के दौरान वैज्ञानिक तकनीकों, खोदाई और ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का उपयोग किया गया। 98 दिन तक चले सर्वे में पुरातत्वविद, तकनीकी विशेषज्ञ और संरचना विश्लेषक शामिल रहे। सर्वे टीम का नेतृत्व एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी ने किया।
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परिसर में परमारकालीन विशाल संरचना होने के संकेत मिले। 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर (अर्ध-स्तंभ) मंदिर संरचनाओं से जुड़े बताए गए। पिलास्टर वास्तुकला का एक तत्व है जो दीवार से जुड़ा एक चपटा, आयताकार स्तंभ होता है।
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कई मूर्तियों और आकृतियों के क्षतिग्रस्त अवस्था में मिलने का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया। यह भी कहा गया कि बाद की संरचना जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है। रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों का उल्लेख है। इनमें कई अभिलेख नागरी लिपि में बताए गए हैं और उनका संबंध परमार शासकों से जोड़ा गया। अभिलेख अरबी-फारसी लेखों से पुराने हैं।