
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : समाज के सामने आज कई चुनौतियां हैं। कुछ रणनीतिक क्षेत्रों में जनसंख्या का स्वरूप बदल रहा है। समाज के कुछ वर्गों में स्वयं को हिंदू नहीं मानने का भावना बढ़ रही है। विदेशी फंडिंग के माध्यम से समाज में विभाजन पैदा करने वाले आंदोलन भी बढ़ रहे हैं।
अलगाववादी प्रवृत्तियां और समाज को बांटने वाले शक्तियां भी चुनौती बन रही हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल शासन के भरोसे नहीं हो सकता। इसके लिए संपूर्ण समाज का सहभागिता आवश्यक है।
यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह कार्यवाह अतुल लिमये ने बुधवार को डेली कॉलेज में कही। वर्तमान में हो रहे आंदोलन पर प्रहार करने के साथ ही उन्होंने राष्ट्र निर्माण में संघ का भूमिका और आने वाले वर्षों में किए जाने वाले कार्यों का रूपरेखा भी रखी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंदौर विभाग के चरैवेति एकत्रीकरण में इंदौर विभाग के पांच जिलों के हजारों स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि समाज की तुलना भगवान जगन्नाथ के रथ से का जा सकती है। जिस प्रकार समाज के सभी लोगों के हाथ लगाने से ही रथ आगे बढ़ता है, उसी प्रकार समाज के सभी वर्गों का भागीदारी से ही राष्ट्र निर्माण का कार्य आगे बढ़ सकता है।
राष्ट्र निर्माण में समाज का सहभागिता बढ़ाने और लोगों को सकारात्मक कार्यों से जोड़ने का व्यवस्था विकसित करनी होगी।बहुत से लोग कुछ अच्छा करना चाहते हैं और समाज को कुछ लौटाने का भावना भी मजबूत हुई है।
कई लोग अपनी क्षमता, योग्यता और अनुभव के अनुसार सेवा कार्य करना चाहते हैं। चुनौती यह है कि उनकी रुचि, कौशल और उपलब्ध समय के अनुसार उन्हें उचित कार्य से कैसे जोड़ा जाए। चरैवेति एकत्रीकरण का आरंभ ध्वजारोहण और संघ प्रार्थना से हुआ। तत्पश्चात् सभी स्वयंसेवकों ने सामूहिक योग प्रदर्शन किया। इन्दौर विभाग कार्यवाह रित्नेश रघुवंशी ने शताब्दी वर्ष में इंदौर विभाग में हुए कार्यक्रमों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। मंच पर मालवा प्रांत के प्रांत संघचालक डॉ. प्रकाशजी शास्त्री, विभाग संघचालक डा मुकेश मोढ और मुख्य अतिथि उद्योगपति प्रशांत शाह उपस्थित थे।
स्वयंसेवकों से सह सरकार्यवाह ने कहा कि समाज का मन बदलना जरूरी है, लेकिन केवल विचारों में बदलाव पर्याप्त नहीं है। समाज के व्यवहार में भी परिवर्तन दिखाई देना चाहिए। हमारा दर्शन और तत्वज्ञान श्रेष्ठ है, फिर भी कहीं-कहीं सामाजिक विषमता के उदाहरण देखने को मिलते हैं। मंदिर प्रवेश और विवाह के समय घोड़ी पर बैठने जैसे विषयों पर विवाद सामने आते हैं। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि सामाजिक समरसता को केवल विचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे अपने व्यवहार में भी उतारना होगा।
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत, साहित्य, कला और मीडिया के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय विचारों से जुड़े अनेक लोग काम कर रहे हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रभावशाली लोगों को भी सकारात्मक उद्देश्यों के लिए जोड़ना होगा। इन सभी के समन्वय से ऐसी व्यवस्था विकसित का जा सकती है, जो समाज को निरंतर एकजुट रखे और विकसित एवं वैभवशाली भारत के निर्माण के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करे।
उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा में वानप्रस्थ आश्रम का व्यवस्था थी। जीवन के एक पड़ाव पर पहुंचने के बाद व्यक्ति अपने अनुभव और कौशल का उपयोग समाज का सेवा के लिए करता था। आज भी समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जिनके पास पर्याप्त अनुभव और योग्यता है। जरूरत इस बात का है कि उनकी क्षमताओं का समाज हित में उपयोग करने के लिए व्यवस्थित तंत्र बनाया जाए।