
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। सड़क दुर्घटना मामले में हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला कोर्ट ने सड़क हादसे में मृत प्रायवेट लिमिटेड कंपनी के ब्रांच मैनेजर के स्वजन को क्षतिपूर्ति के रूप में 32 लाख 20 हजार रुपये देने का आदेश बीमा कंपनी को दिया था। स्वजन ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने आदेश में संशोधन करते हुए क्षतिपूर्ति की राशि बढ़ाकर एक करोड़ 42 लाख रुपये कर दी। 27 पेज के फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आयकर रिटर्न में दर्शाई गई आय को नहीं व्यक्ति को प्राप्त होने वाली अंतिम सैलेरी स्लीप में दर्शाई गई आय को मान्य किया जाना चाहिए।
मृतक को मिलने वाला प्रोविडेंट फंड, हाउस रेंट अलाउंस, मेडिकल समायोजन, विशेष भत्ता, लीव ट्रेवल अलाउंस के मद में प्राप्त राशि कर मुक्त होती है तथा उपरोक्त सभी मदों में प्राप्त राशि से केवल एक व्यक्ति लाभान्वित नहीं होता है बल्कि उससे उसके पूरे परिवार को लाभ प्राप्त होता है इसलिए उन सभी मदों में मिलने वाली राशि को क्षतिपूर्ति राशि में जोड़ा जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृतक के स्वजन को प्रदान की जाने वाली क्षतिपूर्ति राशि के लिए मृतक द्वारा दुर्घटना के पूर्व जमा आयकर रिटर्न निर्णयक नहीं है क्योंकि उसने केवल कर योग्य आय बताई है जबकि अंतिम वेतन पर्ची रिकॉर्ड पर है। ऐसे में क्षतिपूर्ति राशि का निर्धारण करने के लिए अंतिम वेतन पर्ची में वर्णित सभी मदों की राशि को जोडकर उसमे से केवल आयकर एवं व्यवसाय कर घटाकर प्रदान की जाना चाहिए।
32 वर्षीय युवक की दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनके स्वजन ने जिला कोर्ट में क्षतिपूर्ति के लिए वाद प्रस्तुत किया था। कोर्ट ने आयकर रिटर्न के आधार पर बीमा कंपनी को आदेश दिया था कि वह मृतक के स्वजन को 32 लाख 20 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान करें। स्वजन ने यह कहते हुए हाई कोर्ट में अपील प्रस्तुत की थी कि आयकर रिटर्न में दर्शाई गई आय के अतिरिक्त भी आय होती थी।