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'पत्नी' की व्यापक व्याख्या जरूरी, लंबे समय तक पत्नी की तरह साथ रहने वाली महिला को भरण-पोषण देना होगा, MP High Court का आदेश

इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने उमरिया के लिंक फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर महिला के भरण-पोषण संबंधी दावे पर ...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 10 Jul 2026 12:34:52 PM (IST)Updated Date: Fri, 10 Jul 2026 12:57:55 PM (IST)
'पत्नी' की व्यापक व्याख्या जरूरी, लंबे समय तक पत्नी की तरह साथ रहने वाली महिला को भरण-पोषण देना होगा, MP High Court का आदेश
हाई कोर्ट ने की टिप्‍प्‍णी -'पत्नी' शब्द की व्यापक व्याख्या जरूरी।

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले का हवाला
  2. फैमिली कोर्ट का आदेश को किया निरस्त
  3. महिला के भरण-पोषण दावे पर नए सिरे से सुनवाई के निर्देश

सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण के मामलों में पत्नी शब्द की व्याख्या केवल तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप की जानी चाहिए।

वैधानिकता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता

यदि कोई महिला लंबे समय तक पत्नी के रूप में साथ रही हो और उससे संतान भी जन्मी हो, तो उसके दावे को केवल विवाह की वैधानिकता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

रामकली की याचिका पर मिला राहत का अवसर

याचिकाकर्ता रामकली कुशवाहा ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कर फैमिली कोर्ट के 25 जून, 2019 के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने महिला को विधिक पत्नी मानने से इन्कार करते हुए उसके भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया था।


दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश

दोनों पक्षों की नाबालिग पुत्री कु. शिवानी कुशवाहा को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी के साथ शांतनु तिवारी व अंजलि मेहरा ने पक्ष रखा।

व्याख्या के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एन उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवा (2025) के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि महिला के दावे पर भी कानून की सामाजिक न्याय आधारित व्याख्या के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए।

धारा 125 का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा

हाई कोर्ट ने माना कि रिकार्ड पर उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि महिला और प्रतिवादी मनोज कुशवाहा पति-पत्नी की तरह साथ रहे व उनसे पुत्री का जन्म हुआ।

महिलाओं और बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है

कोर्ट ने कहा कि धारा 125 का उद्देश्य परित्यक्त महिलाओं और बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। इसलिए ऐसे मामलों में संबंधों की वास्तविकता, साथ रहने की अवधि और उपलब्ध साक्ष्यों का व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है।

पक्षकार तीन अगस्त, 2026 को फैमिली कोर्ट में उपस्थित रहें

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को आवेदन मूल क्रमांक पर बहाल कर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुए नए सिरे से निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। पक्षकारों को तीन अगस्त, 2026 को फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने के लिए कहा गया है।

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