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जबलपुर को फिर झटका! आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का बंटवारा, 'मेडिकल राजधानी' की पहचान पर चोट

अब नए विभाजन के बाद विश्वविद्यालय के पास सीमित संख्या में कालेज और विद्यार्थी ही रह जाने का अनुमान है। विश्वविद्यालय के दायरे में कमी के साथ प्रशासनिक...और पढ़ें

By Ramkrishan paramhans pandeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Mon, 20 Jul 2026 09:59:20 AM (IST)Updated Date: Mon, 20 Jul 2026 09:59:20 AM (IST)
जबलपुर को फिर झटका! आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का बंटवारा, 'मेडिकल राजधानी' की पहचान पर चोट
पहले भी कई अहम संस्थानों के अधिकार और मुख्यालय जबलपुर से हो चुके हैं दूर।

HighLights

  1. जबलपुर और उज्जैन में अलग-अलग मेडिकल विश्वविद्यालय होंगे
  2. विभाजन के बाद जबलपुर के अधीन रहेंगे महाकोशल और विंध्य के काॅलेज
  3. शहर में फिर उठा सवाल- क्या लगातार कमजोर हो रहा है जबलपुर?

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के विखंडन को राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद जबलपुर में इसे केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि शहर के संस्थागत महत्व में एक और कमी के रूप में देखा जा रहा है।

एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी दो भागों में संचालित होगी

रविवार को कैबिनेट ने 'मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक' को स्वीकृति दी, जिसके बाद प्रदेश की एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी दो भागों में संचालित होगी।

मेडिकल, डेंटल एवं आयुष कालेज जबलपुर के अधीन रहेंगे

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार महाकोशल और विंध्य अंचल के मेडिकल, डेंटल एवं आयुष कालेज जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय के अधीन रहेंगे, जबकि भोपाल, इंदौर सहित मध्य और पश्चिमी मध्य प्रदेश के कालेज उज्जैन में बनने वाली नई मेडिकल यूनिवर्सिटी से संबद्ध होंगे।


विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना

जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय के अधीन कालेजों और विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है। इस मामले में मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलगुरु डाॅ. अशोक खंडेलवाल से बातचीत करने का प्रयास किया गया, परंतु चर्चा नहीं हो पाई।

  • कैबिनेट ने संशोधन विधेयक को दी मंजूरी
  • प्रदेश की एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी दो हिस्सों में विभाजित
  • 80 से अधिक कालेजों वाला विश्वविद्यालय सिमटकर रह जाएगा करीब 10 कालेजों तक।
  • पहले नर्सिंग- पैरामेडिकल कालेज अलग हुए, अब मेडिकल कालेजों का भी बंटवारा।

550 से अधिक कालेज और लगभग 60 हजार विद्यार्थी थे

जानकारों का मानना है कि कुछ वर्ष पहले नर्सिंग और पैरामेडिकल कालेजों को क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध किए जाने के बाद यह दूसरा बड़ा पुनर्गठन है। वर्ष 2011 में स्थापना के समय विश्वविद्यालय के अधीन 550 से अधिक कालेज और लगभग 60 हजार विद्यार्थी थे।

प्रतिवर्ष अतिरिक्त वित्तीय भार भी आएगा

पहले पुनर्गठन के बाद यह संख्या घटकर करीब 80 कालेज और 16 हजार विद्यार्थियों तक रह गई थी। सूत्रों के अनुसार नई व्यवस्था के संचालन पर प्रतिवर्ष अतिरिक्त वित्तीय भार भी आएगा।

16 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं

शिक्षा जगत के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थागत आकार घटने से विश्वविद्यालय की निर्णय क्षमता, शैक्षणिक प्रभाव और दीर्घकालिक पहचान प्रभावित हो सकती है। वर्तमान में विश्वविद्यालय से 80 से अधिक मेडिकल, डेंटल और आयुष कालेज संबद्ध हैं, जिनमें 16 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

लगभग 1500 से 2000 विद्यार्थी ही बचने की संभावना

विभाजन के बाद जबलपुर विश्वविद्यालय के हिस्से में महज करीब 10 कालेज और लगभग 1500 से 2000 विद्यार्थी ही बचने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासनिक ढांचे के पुनर्गठन पर हर वर्ष करीब 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय भी अनुमानित है।

पुराने सवालों को भी फिर चर्चा में ला दिया

मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय को लेकर हुए फैसले ने जबलपुर से जुड़े पुराने सवालों को भी फिर चर्चा में ला दिया है।

व्यापारिक संगठनों का लंबे समय से आरोप

शहर के विभिन्न सामाजिक और व्यापारिक संगठनों का लंबे समय से आरोप रहा है कि पिछले दो दशकों में कई महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों के मुख्यालय अथवा प्रमुख प्रशासनिक अधिकार जबलपुर से अन्य शहरों में स्थानांतरित किए गए।

स्थानीय स्तर पर व्यापक चर्चा का विषय

राज्य विद्युत मंडल, आबकारी आयुक्त कार्यालय, भूविज्ञान एवं खनन संचालनालय, बीमा संचालनालय तथा अन्य विभागों के नाम प्रमुखता से गिनाए जाते रहे हैं। अब मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का विभाजन भी स्थानीय स्तर पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।

जबलपुर की संस्थागत भूमिका में लगातार हो रही कमी

कई नागरिक संगठन इसे जबलपुर की संस्थागत भूमिका में लगातार हो रही कमी की कड़ी मान रहे हैं। वहीं राजनीतिक हलकों में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या शहर का नेतृत्व अपने प्रमुख संस्थानों को संरक्षित रखने में अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पा रहा है।

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