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    ओरछा स्थित श्रीरामराजा सरकार मंदिर के व्यवस्थापक पद मामले में हाईकोर्ट ने निरस्‍त किया जिला कोर्ट का आदेश

    याचिका के अनुसार वर्ष 2017 में बघेल ओरछा स्थित श्रीरामराजा सरकार मंदिर के व्यवस्थापक व तहसीलदार के पद पर पदस्थ थे। मंदिर के क्लर्क मुन्नालाल तिवारी के...और पढ़ें

    By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
    Publish Date: Wed, 17 Jun 2026 09:26:17 PM (IST)Updated Date: Wed, 17 Jun 2026 09:30:06 PM (IST)
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    ओरछा स्थित श्रीरामराजा सरकार मंदिर के व्यवस्थापक पद मामले में हाईकोर्ट ने निरस्‍त किया जिला कोर्ट का आदेश
    ओरछा स्थित श्रीरामराजा सरकार मंदिर।

    HighLights

    1. कोर्ट ने कहा, किसी को सुने बिना कलंकपूर्ण या प्रतिकूल टिप्पणी करना अनुचित।
    2. साथ ही तहसीलदार को आरोपित जैसा बताने को प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध माना।
    3. भोपाल में पदस्थ तहसीलदार गुलाब सिंह बघेल की याचिका स्वीकार करके दी राहत।

    नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि किसी व्यक्ति को सुने बिना उसके खिलाफ कलंकपूर्ण या प्रतिकूल टिप्पणी करना प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

    इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश का वह हिस्सा निरस्त कर दिया, जिसमें एक तहसीलदार को बिना पक्षकार बनाए मामले में सहभागी बताया गया था। हाई कोर्ट ने भोपाल में पदस्थ तहसीलदार गुलाब सिंह बघेल की याचिका स्वीकार करते हुए यह राहत प्रदान की।

    याचिका के अनुसार वर्ष 2017 में बघेल ओरछा स्थित श्रीरामराजा सरकार मंदिर के व्यवस्थापक व तहसीलदार के पद पर पदस्थ थे। मंदिर के क्लर्क मुन्नालाल तिवारी के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की शिकायतों पर जांच हुई, जिसके बाद उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज किया गया।


    अग्रिम जमानत अर्जी निरस्त करते समय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने आदेश में यह टिप्पणी कर दी थी कि कमरे की चाबी व्यवस्थापक के पास रहती थी, इसलिए तहसीलदार भी कथित कृत्य में सहभागी हैं और उनके खिलाफ जांच शेष है। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणी जमानत अर्जी के निपटारे के लिए आवश्यक नहीं थी।

    याचिकाकर्ता न तो उस कार्यवाही का पक्षकार था और न ही उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बाद की विभागीय जांच में सक्षम प्राधिकारी ने उसे दोषमुक्त पाया था। इन परिस्थितियों में प्रतिकूल टिप्पणी को असंगत मानते हुए हाई कोर्ट ने विवादित आदेश निरस्त कर दिया।