मध्य प्रदेश की राजनीति में यू-टर्न, अब निर्मला सप्रे की ओर से दावा किया गया कि वे अभी भी कांग्रेस पार्टी में
कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी की विधायक पर पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगाया गया है। लोकसभा चुनाव के दौरान 5 मई, 2024 को राहतगढ़ में मुख्यमंत्री मोहन य ...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 31 Mar 2026 08:00:05 PM (IST)Updated Date: Tue, 31 Mar 2026 08:05:52 PM (IST)
निर्मला सप्रेHighLights
- हाई कोर्ट ने जवाब को अभिलेख पर लिया, अगली सुनवाई 20 अप्रैल को नियत की।
- याचिकाकर्ता उमंग सिंघार को स्पीकर के सामने नौ अप्रैल को अपना पक्ष रखना है।
- कांग्रेस ने अपनी पार्टी की विधायक पर लगाया है पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप।
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष मंगलवार को बीना विधायक निर्मला सप्रे के विरुद्ध नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई हुई। मामले में उस समय नया मोड़ आया जब हाई कोर्ट के पूछने पर निर्मला सप्रे की ओर से दावा किया गया कि वे अभी भी कांग्रेस पार्टी में हैं।
अब इस मामले में याचिकाकर्ता उमंग सिंघार को विधानसभा स्पीकर के सामने नौ अप्रैल को अपना पक्ष रखना है। इसके मद्देनजर कोर्ट ने मामले पर अगली सुनवाई 20 अप्रैल को नियत की है। सप्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने पक्ष रखा। विगत सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा था कि 16 माह बीतने के बावजूद सिंघार की याचिका पर विधानसभा अध्यक्ष ने निर्णय क्यों नहीं लिया।
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उल्लेखनीय है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने यह याचिका दायर की है। सिंघार ने कांग्रेस की बीना से विधायक निर्मला सप्रे का निर्वाचन शून्य करने की मांग की है। याचिकाकर्ता के अनुसार 30 जून 2024 को उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष तोमर के समक्ष इस मामले में याचिका दायर की थी। लेकिन निर्धारित 90 दिन के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की गई। लिहाजा, हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।
कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी की विधायक पर पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगाया गया है। लोकसभा चुनाव के दौरान 5 मई, 2024 को राहतगढ़ में मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच पर पहुंची थीं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि कांग्रेस विधायक सप्रे भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। इसके बावजूद उन्होंने विधायक पद से त्यागपत्र नहीं दिया है। दलबदल कानून के प्रकाश में उनका यह रवैया गैर कानूनी है।
इसलिए सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए। राज्य शासन की ओर से दलील दी गई थी कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार जब तक विस अध्यक्ष किसी याचिका पर निर्णय न ले लें, तब तक हाई कोर्ट को पुनरीक्षण का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी याचिका पर फैसला लेना विस अध्यक्ष का परमाधिकार है।