MP High Court का बड़ा फैसला... 10 साल से कार्यरत संविदा कर्मियों को मिलेगा स्थायी कर्मचारियों जैसा लाभ
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने मध्य प्रदेश में 16 वर्ष से अधिक समय से कार्यरत कई संविदा कर्मियों के हक में राहतकारी आदेश पारित किया। ...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 15 Apr 2026 08:30:50 PM (IST)Updated Date: Wed, 15 Apr 2026 08:30:50 PM (IST)
MP High Court का बड़ा फैसलाHighLights
- 10 साल की सेवा वाले संविदा कर्मियों को मिलेगा नियमितीकरण का लाभ
- आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारी भी अब आर्थिक न्याय के हकदार होंगे
- हाई कोर्ट ने संविदा कर्मियों को न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने मध्य प्रदेश में 16 वर्ष से अधिक समय से कार्यरत कई संविदा कर्मियों के हक में राहतकारी आदेश पारित किया। कोर्ट ने साफ किया कि अनुबंध, आउटसोर्स और अंशकालिक आधार पर लगे संविदा कर्मचारी वर्गीकरण और परिणामी लाभों के हकदार हैं, यदि वे लगातार एक दशक से अधिक समय से कार्यरत हैं।
कोर्ट ने श्रमिकों द्वारा दायर याचिकाओं को इस टिप्पणी के साथ स्वीकार कर लिया कि ऐसे कर्मचारी आर्थिक न्याय और सभ्य जीवन स्तर के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को नीति के तहत वर्गीकरण का लाभ दिया जाना चाहिए और उनके पदों के अनुरूप न्यूनतम वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए।
विभागों में वर्षों से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों की दलील
जबलपुर सहित प्रदेश के अन्य स्थानों में विभिन्न विभागों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों की ओर से याचिकाएं दायर की गईं थीं। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को सात जुलाई, 2009 के एक आदेश द्वारा अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था। परिणामस्वरूप, उनके नियुक्ति आदेश 30 जुलाई, 2009 को जारी किए गए थे। इसके बाद याचिकाकर्ताओं की सेवाएं उक्त विभाग द्वारा जारी रखी गईं, और वे अभी भी वहां काम कर रहे हैं। कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार ने कर्मचारियों को स्थायी के रूप में वर्गीकृत करने और उन्हें उनके पदों के लिए स्वीकार्य न्यूनतम वेतनमान देने की नीति बनाई है।
संविधान के अनुच्छेदों का हवाला और भेदभाव का दावा
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उक्त लाभ उन्हें भी दिया जा सकता है, क्योंकि नियमितीकरण में भेदभाव किया जा रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के प्रावधानों का उल्लंघन है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं को नीति के तहत वर्गीकरण का लाभ दिया जाना चाहिए और उनके पदों के अनुरूप न्यूनतम वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए। कोर्ट ने याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और अधिकारियों को 2016 की नीति के तहत याचिकाकर्ताओं को वर्गीकृत करने और सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।