
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने ठगी के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कथित ठगी की रकम जमा होना मात्र उसे अपराध में जानबूझकर शामिल मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।
न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी ने 78 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी व पूर्व सैनिक को अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। मामला कर्नाटक निवासी गोविंदप्पा जयरामैया बनाम मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार बीमा राशि दिलाने का झांसा देकर शिकायतकर्ता से करीब 26.11 लाख रुपये की ठगी की गई।
जांच में पाया गया कि छह जुलाई से 26 दिसंबर, 2023 के बीच शिकायतकर्ता के खाते से आरोपित के बैंक खाते में 15.15 लाख रुपये भेजे गए थे। पुलिस ने इसे प्रथमदृष्टया अपराध की आय माना। बचाव पक्ष ने बताया कि आरोपित को एक अज्ञात व्यक्ति ने बीमा राशि दिलाने का भरोसा दिया था। उसी के झांसे में आकर आरोपित ने अपने बैंक खाते और डेबिट कार्ड से संबंधित जानकारी साझा कर दी।
खाते में रकम आने और उसके बाद लेनदेन होने की जानकारी उसे नहीं थी। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने बैंक खाते में रकम जमा होने के संबंध में स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया है। मामले के मुख्य साक्ष्य बैंकिंग और इलेक्ट्राॅनिक लेनदेन से जुड़े हैं, जिन्हें दस्तावेजी एवं इलेक्ट्राॅनिक साक्ष्यों के माध्यम से जांचा जा सकता है।
ऐसे में हिरासत में लेकर पूछताछ आवश्यक होने का ठोस आधार सामने नहीं आया। कोर्ट ने आरोपित की अधिक उम्र, सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी व पूर्व सैनिक होने और पूर्व आपराधिक रिकाॅर्ड नहीं होने को भी ध्यान में रखा। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने अग्रिम जमानत मंजूर कर दी।
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