
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाईकोट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि फैसले का जवाब अपील है, जज को धमकी नहीं।
कानून के शासन में असहमति का अधिकार है, लेकिन न्यायाधीश को डराने-धमकाने का नहीं। न्यायाधीश लोकप्रिय भावनाओं से नहीं, संविधान, कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देते हैं। यदि हर कठोर फैसले के बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़े, तो निष्पक्ष न्याय की पूरी व्यवस्था दबाव में आ जाएगी।
मामला सिवनी मालवा में पदस्थ महिला जज तबस्सुम खान को गौहत्या के बहुचर्चित मामले में 14 आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद सोशल मीडिया पर मिली धमकियों से संबंधित है। इस प्रकरण ने न केवल एक न्यायाधीश की सुरक्षा का प्रश्न उठाया है बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी गंभीर चिंता खड़ी कर दी है।
हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव गृह से हलफनामा तलब कर पूछा है कि महिला जज की सुरक्षा के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध कराने और आपत्तिजनक पोस्ट हटाने की कार्रवाई की जानकारी दी है। जिसे रिकार्ड में ले लिया।
कोर्ट ने पूछा कि क्या राज्य के पास न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा का ऐसा स्थायी और प्रभावी तंत्र है, जो केवल घटना के बाद नहीं, बल्कि पहले से ही सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मामला किसी एक महिला जज का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और आम नागरिक के न्याय पर विश्वास का है। न्याय की कुर्सी भयमुक्त रहेगी, तभी संविधान का शासन मजबूत रहेगा।
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