
सुरेंद्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। बीमा कंपनियां अक्सर दुर्घटना की सूचना देने में हुई देरी को आधार बनाकर दावों को अस्वीकार कर देती हैं, लेकिन जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जबलपुर के महत्वपूर्ण फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि वास्तविक दुर्घटना होने पर मात्र तकनीकी कारणों से बीमाधारक के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।
आयोग ने माना कि उपभोक्ता संरक्षण कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ित को राहत देना है न कि प्रक्रिया संबंधी कमियों का सहारा लेकर उसके वैध अधिकारों से वंचित करना।
आयोग के अध्यक्ष पंकज यादव एवं सदस्य सोनल पंडित की पीठ ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए बैतूल निवासी मोहन चक्र अग्रवाल के पक्ष में राहत के आदेश दिए। परिवादी की बोलेरो वर्ष 2020 में दुर्घटनाग्रस्त होकर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी।
बीमा कंपनी ने दुर्घटना की सूचना करीब चार वर्ष चार माह बाद मिलने, वाहन के कथित व्यावसायिक उपयोग तथा क्षमता से अधिक सवारियां होने का हवाला देकर दावा निरस्त कर दिया था।
परिवादी की ओर से अधिवक्ता अरुण जैन ने सर्वोच्च न्यायालय के ओम प्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि दुर्घटना वास्तविक है तो सूचना देने में हुई देरी अकेले दावा अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती।
आयोग ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि बीमा कंपनी के अपने सर्वेयर ने भी दुर्घटना और वाहन की क्षति को वास्तविक पाया था। ऐसे में दावा निरस्त करना उपभोक्ता के साथ अन्याय है। आयोग ने कंपनी को नियमानुसार दावा निपटाने और परिवादी को राहत देने के निर्देश दिए।
यह निर्णय उन हजारों बीमाधारकों के लिए राहतभरा संदेश है, जिनके दावे केवल तकनीकी कारणों का हवाला देकर अस्वीकार कर दिए जाते हैं। आयोग ने संकेत दिया है कि बीमा अनुबंध का उद्देश्य संकट की घड़ी में उपभोक्ता को सुरक्षा देना है।
यदि दुर्घटना और नुकसान वास्तविक हैं तथा उनमें किसी प्रकार की धोखाधड़ी सिद्ध नहीं होती, तो केवल प्रक्रिया संबंधी देरी के आधार पर दावा ठुकराना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को और मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है।
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