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जेनेवा में भी उठ चुका है कटनी के कैमोर के प्रदूषण का मामला, आज भी डंप है दस लाख टन एस्बेस्टस का जहरीला कचरा

विश्व स्तरीय सम्मेलन में कहा गया था कि कैमोर नगर व आसपास के गांवों में फाइबर रेशे और डस्ट मानव जीवन को प्रभावित कर रहा है। भारत की पहली एस्बेस्ट फैक्ट...और पढ़ें

By Mukesh TiwariEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Sat, 26 Sep 2026 11:00:25 PM (IST)Updated Date: Sat, 26 Sep 2026 11:00:25 PM (IST)
जेनेवा में भी उठ चुका है कटनी के कैमोर के प्रदूषण का मामला, आज भी डंप है दस लाख टन एस्बेस्टस का जहरीला कचरा
कंपनी का वर्षों पुराना स्कूल, जिसके पास भी कचरा एकत्र है। सौजन्य ग्रामीण

HighLights

  1. कंपनी टर्नर एंड न्यूआल ने काम शुरू किया था
  2. कनाडा से आए वैज्ञानिकों ने लिए थे नमूने
  3. अमेरिका से जांच रिपोर्ट गंभीर आई थी

नईदुनिया प्रतिनिधि, कटनी। कटनी के कैमोर में खुलने वाली भारत की पहली एस्बेस्ट फैक्ट्री के छोड़ा गया दस लाख टन एस्बेस्टस का जहरीला कचरा फिर से चर्चा में है। कैमोर में वर्ष 1933 में ब्रिटिश शासनकाल में एस्बेस्टस से जुड़ी कंपनी टर्नर एंड न्यूआल ने काम शुरू किया था।

स्कूल के पीछे और कलेहरा गांव में डंप किया गया कचरा आज भी

अब उस समय से लेकर 1988 तक के बीच के दस लाख टन जहरीले कचरे को कैमोर की फैक्ट्री के पास मैदान, स्कूल के पीछे और कलेहरा गांव में डंप किया गया, जो आज भी वहां है।

भारत भर में प्रदूषण व एस्बेस्टस से होने वाली बीमारी की चर्चा हो चुकी है

मामले को लेकर न सिर्फ भारत भर में प्रदूषण व एस्बेस्टस से होने वाली बीमारी की चर्चा हो चुकी है, बल्कि कैमोर के जहरीले कचरे का मुद्दा जेनेवा में भी उठ चुका है।

जेनेवा में पर्यावरण असंतुलन सेमीनार का आयोजन हुआ था

वर्ष अप्रैल 2017 में जेनेवा में पर्यावरण असंतुलन सेमीनार का आयोजन हुआ था। जिसमें निर्मला गुरूंग ने कैमोर के इस जानलेवा कचरे का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था।

कलेहरा गांव में मिट्टी, पानी व वायु आदि की जांच की थी

वहीं कनाडा से आए वैज्ञानिकों के दल ने भी कलेहरा गांव के आसपास मिट्टी, पानी व वायु आदि की जांच की थी, नमूनों को अमेरिका की एक संस्था को भेजा गया था और जांच के दौरान भी रिपोर्ट गंभीर आई थी।


स्कूल से जुड़े अधिकांश प्रभावित

कैमोर में संचालित कंपनी को ब्रिटिश कंपनी ने 1988 में एटरनिट बिल्डिंग प्रोजेक्टस लिमिटेड को बेच दिया था और उसके साथ सभी दस्तावेज भी कंपनी को सौंप दिए थे। वर्ष 2001 में एवरेस्ट इंडस्ट्रीज ने इसे खरीद लिया था, जो आज भी उसे संचालित कर रही है।

कंपनी के मालिक बदलते, लेकिन कचरा वहीं है

कंपनी के मालिक बदलते गए, लेकिन एस्बेस्टस का जहरीला कचरा गायब नहीं हुआ। कंपनी की 80 एकड़ भूमि है और उसी परिसर में वर्ष 1940 से स्कूल संचालित हो रहा है। 86 वर्ष में स्कूल में कई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं।

बीमारी के मामलों का कोई सरकारी रिकार्ड उपलब्ध नहीं

एस्बेस्टस से पीड़ितों को मुआजवा दिलाने और उनके हक में पिछले 12 साल से काम कर रहे श्रमिक नेता सरवर खान का कहना है कि पूर्व छात्रों में एस्बेस्टस से संबंधित बीमारी के मामलों का कोई सरकारी रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।

मुआवजा प्राप्त करने वाले 12 सौ से अधिक लोग हैं

श्रमिक नेता का कहना है कि अभी तक सामने आई रिपोर्ट के अनुसार कैमोर के एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारी के लिए मुआवजा प्राप्त करने वाले 12 सौ से अधिक लोग हैं और उनमें से अधिकांश स्कूल से जुड़े लोग हैं।

लोगों के संपर्क में आने की आशंका

सरवर खान ने बताया कि उनके भाई रमजान खान (74 वर्ष) और अनवर खान (61 वर्ष) भी ऐसे लोगों में शामिल हैं, जिनकी एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारी के कारण मौत होने की जानकारी है। एस्बेस्टस का पर्यावरणीय जोखिम केवल फैक्ट्री के श्रमिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों, खदानों, कचरा स्थलों से भी लोगों के संपर्क में आने की आशंका बनी हुई है।

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