
नईदुनिया प्रतिनिधि, नरसिंहपुर। जिला मुख्यालय का श्री गणेश देवस्थानम् अपनी पौराणिक मान्यताओं, अलौकिक चमत्कारों और 250 साल पुराने इतिहास के कारण पूरे प्रदेश और देश में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक हरियाली और खेत-खलिहानों के बीच स्थित होने के कारण स्थानीय लोग इसे 'शक्ति वाले बगीचा' के नाम से भी पुकारते हैं।
मान्यता है कि यहां जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मन्नत लेकर आता है, प्रथम पूज्य उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं। यही वजह है कि माघ माह की तिल चतुर्थी पर यहां विशाल मेला लगता ही है, साथ ही महाशिवरात्रि और आम दिनों में भी देश भर से श्रद्धालु 'मन्नतपूर्ति के द्वार' पर माथा टेकने पहुंचते हैं।
दायीं सूंड की दुर्लभ प्रतिमा और बरगद के तने का चमत्कार
देशभर के मंदिरों में स्थापित अधिकांश गणेश प्रतिमाओं की सूंड बायीं ओर होती है, लेकिन किसानी वार्ड स्थित इस शक्तिपीठ की सबसे बड़ी खासियत यहां विराजित दायींवर्ती सूंड वाली प्रतिमा है।
तेजस्वी स्वरूप
सफेद संगमरमर से निर्मित पूर्व मुखी यह प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ, शांत, मनोहारी और सिद्ध फल देने वाली मानी जाती है।
वटवृक्ष पर प्राकृतिक एकदंत आकृति
देवस्थानम् परिसर में स्थित लगभग ढाई सौ साल पुराने विशालकाय वटवृक्ष (बरगद) के तने पर प्राकृतिक रूप से उभरी एकदंत श्री गणेश की आकृति हर दर्शनार्थी को अचरज में डाल देती है। यह अलौकिक उपस्थिति भक्तों को विश्वास दिलाती है कि यहाँ प्रकृति में भी गणपति विराजमान हैं।
सिंदूर और चोला चढ़ाने की परंपरा
यहां प्रतिमा पर सिंदूर और चोला अर्पित करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस विशेष पूजा से श्रद्धालुओं के बड़े से बड़े विघ्न दूर हो जाते हैं।
सन 1781 का इतिहास: जब 'विघ्नहर्ता' ने बदला अपना धाम
इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, सन 1781 में नरसिंहपुर के एक जाट सरदार ने क्षेत्र में एक विशाल मंदिर का निर्माण शुरू कराया था।
तीन भागों में विभाजित था मूल मंदिर
पुरातन योजना के अनुसार, जाट सरदार द्वारा बनाए जा रहे मंदिर को तीन हिस्सों में बांटा गया था- मध्य में नरसिंह भगवान, दाहिने भाग में भगवान शिव और बायीं ओर श्री गणेशजी की प्रतिमा स्थापित की जानी थी।
अस्थायी स्थापना से बना स्थायी स्थल
निर्माण कार्य पूरा होने तक गणेश प्रतिमा को पास के कार्यशाली बगीचे में एक छोटे मंदिर में रखवाया गया। जब मूल मंदिर बनकर तैयार हुआ, तो सरदार प्रतिमा को वहां ले जाने लगे।
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सपने में मिला ईश्वर का संदेश
कहा जाता है कि श्री गणेश ने जाट सरदार को स्वप्न में दर्शन देकर बगीचे वाले स्थान को न छोड़ने का निर्देश दिया। सरदार ने इसे भगवान की इच्छा मानकर अपना निर्णय बदल दिया और प्रतिमा वहीं स्थापित रहने दी।
127 वर्षों बाद पुरोहित परिवार ने कराया भव्य जीर्णोद्धार
लंबी अवधि तक लघु स्वरूप में पूजा-अर्चना के बाद, 1990 के दशक में इस पावन स्थल को विशाल और भव्य रूप देने का संकल्प स्वर्गीय पंडित कृष्णकुमार पुरोहित ने लिया।
27 जनवरी 1997 को हुआ पुनरुद्धार
लगभग 127 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, माघ चतुर्थी (27 जनवरी 1997) को आयोजित भव्य धार्मिक अनुष्ठान के साथ मंदिर का नया और विशाल स्वरूप सामने आया।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेवा जारी
वर्तमान में स्वर्गीय पंडित कृष्णकुमार पुरोहित के सुपुत्र पंडित सुशांत पुरोहित और पंडित शैलेष पुरोहित स्थानीय धर्मप्रेमी जनता के सहयोग से मंदिर का संचालन, सौंदर्यीकरण और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा से कर रहे हैं।
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