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ओरछा रामराजा मंदिर घोटाला: 9 साल बाद भी अधूरी रही जांच, हाई कोर्ट ने पूर्व क्लर्क के खिलाफ दर्ज FIR की रद

निवाड़ी के एसपी डॉ. राय सिंह नरवरिया ने कहा कि यह एकलपीठ का आदेश है और पुलिस इसके खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील करेगी, क्योंकि निवाड़ी जिला बनने के कारण ...और पढ़ें

By Manish AsatiEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Sun, 21 Jun 2026 01:46:49 PM (IST)Updated Date: Sun, 21 Jun 2026 01:47:22 PM (IST)
ओरछा रामराजा मंदिर घोटाला: 9 साल बाद भी अधूरी रही जांच, हाई कोर्ट ने पूर्व क्लर्क के खिलाफ दर्ज FIR की रद
ओरछा स्थित श्रीरामलला मंदिर। सोशल मीडिया

HighLights

  1. 2017 में सामने आई थी वित्तीय गड़बड़ी
  2. तहसीलदार पर नहीं हुई कार्रवाई
  3. क्लर्क की सेवा की थी समाप्त

नईदुनिया न्यूज, ओरछा। अयोध्या में श्रीरामलला मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ी की जांच के लिए जहां एक तरफ एसआईटी का गठन किया गया है। वहीं बुंदेलखंड की अयोध्या कहे जाने वाले ओरछा के विश्वप्रसिद्ध श्री रामराजा सरकार मंदिर में वित्तीय अनियमितताओं की जांच 9 साल बाद भी पूरी नहीं हो सकी। जांच में हुए इस अत्यधिक विलंब का नतीजा यह हुआ कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिर के तत्कालीन लिपिक मुन्नालाल तिवारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।

जबलपुर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई

जबलपुर हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रशासनिक कठिनाइयां, अधिकारियों के तबादले, सेवानिवृत्ति या दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया जैसे बहानों से लगभग एक दशक तक जांच को लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।


कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह देरी संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों को मिले त्वरित और निष्पक्ष न्याय के अधिकार का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि आपराधिक कानून किसी भी नागरिक के सिर पर अनिश्चितकाल तक लटकी तलवार नहीं बन सकता।

2017 में मामला आया था सामने

यह पूरा मामला वर्ष 2017 में अविभाजित टीकमगढ़ जिले में सामने आया था, जब तत्कालीन कलेक्टर प्रियंका दास के निर्देश पर हुई जांच में मंदिर के खातों, दान राशि, आभूषणों, नकद बही-खातों और संपत्तियों में गंभीर वित्तीय गड़बड़ियां पाई गई थीं। संयुक्त जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर 10 सितंबर 2017 को ओरछा थाने में धोखाधड़ी और गबन की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसके बाद मुन्नालाल तिवारी की सेवा समाप्त कर दी गई थी। हालांकि जांच रिपोर्ट में तत्कालीन तहसीलदार गुलाब सिंह बघेल की भूमिका पर भी सवाल उठे थे, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और वे ट्रांसफर पर चले गए, जबकि छोटे कर्मचारी पर गाज गिरी।

इस मामले में याचिकाकर्ता मुन्नालाल तिवारी का तर्क था कि वे केवल एक क्लर्क थे, जबकि सभी वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय तहसीलदार एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिए जाते थे। कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने राहत की सांस लेते हुए कहा कि यह मंदिर के आसपास अतिक्रमण करने वालों की उनके खिलाफ साजिश थी, क्योंकि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया था।

दूसरी ओर प्रशासन इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में है। निवाड़ी के एसपी डॉ. राय सिंह नरवरिया ने कहा कि यह एकलपीठ का आदेश है और पुलिस इसके खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील करेगी, क्योंकि निवाड़ी जिला बनने के कारण कई प्रशासनिक बाधाएं आईं और विभागों से समय पर साक्ष्य न मिलने के कारण जांच में देरी हुई।