
नईदुनिया प्रतिनिधि, उमरिया। शहडोल और अनूपपुर जिलों की सीमा पर एक बार फिर जंगली हाथियों की चहल-पहल ने लोगों की नींद उड़ा दी है। यह जान लेना जरूरी है कि हाथियों का यहां विचरण कोई नई बात नहीं है। ओड़िशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ के रास्ते मध्य प्रदेश में प्रवेश करने वाले जंगली हाथी पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में आ रहे हैं। पूर्व मध्य क्षेत्र में तो हाथियों का फैलाव 1980 में ही शुरू हो गया था।
वर्ष 2018 में प्रदेश के उमरिया जिले के बांधवगढ़, सीधी के संजय धुबरी, शहडोल जिले के जयसिंह नगर, ब्यौहारी, जैतपुर, अनपूपुर, डिडौंरी और मंडला में जंगली हाथियों के प्रवेश के साथ इस समस्या का अध्ययन शुरू हुआ। इस दौरान यह बात निकलकर सामने आई कि दरअसल जंगली हाथी तो अपने पुरातन रास्तों पर ही लौट कर आए हैं।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वन्यजीव संरक्षणवादी और शोधकर्ता अनिरुद्ध धमोरीकर ने अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा हैं कि हाथी बस मध्य प्रदेश में अपने ऐतिहासिक रास्तों का पता लगा रहे हैं। हमने उन पर उनके पैतृक देश में ही बाहरी होने का लेबल लगा दिया।
इतिहास से पता चलता है कि मुगल साम्राज्य के दौरान मारवाड़, चंदेरी, सतवास, बीजागढ़ और पन्ना जैसे मध्य भारत के अनेक हिस्सों में हाथी बहुतायत में पाए जाते थे। कान्हा टाइगर रिजर्व के सेवानिवृत्त रिसर्च अधिकारी डॉ. राकेश शुक्ला बताते हैं कि मध्य प्रदेश के जंगलों से मुगल सेना के लिए जंगली हाथी पकड़कर ले जाए जाते थे।
वर्ष 2021 में गठित हाथी टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मध्य प्रदेश में जंगली हाथियों का प्रवास भारत में पूर्व-मध्य क्षेत्र में हाथियों के चल रहे फैलाव का हिस्सा है। यह सिलसिला 1980 के दशक में हाथियों के आने से शुरू हुआ था।
2000 में छत्तीसगढ़ से, जंगली हाथी मध्य प्रदेश के सीधी, सिंगरौली और शहडोल जिलों में आने लगे, जहां वे दो-तीन महीने तक रहते थे और फिर छत्तीसगढ़ लौट जाते थे, लेकिन 2017 में सात हाथियों के एक झुंड ने एमपी नहीं छोड़ा और सीधी के संजय धुबरी टाइगर रिजर्व में रहने लगे। 2018 में 40 से ज्यादा हाथियों के एक और झुंड ने मध्य प्रदेश में प्रवेश किया और उमरिया के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में रहने लगा। आज इनकी संख्या 65 से ज्यादा है।
छत्तीसगढ़ की सीमा से सिंगरौली जिले में जंगली हाथी आते हैं जो अब तक मंडला, सिवनी, सिंगरौली, अनूपपुर, शहडोल, नरसिंहपुर, सीधी, होशंगाबाद, जबलपुर, उमरिया, छिंदवाड़ा तक उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इनके प्रवेश के साथ ही द्वंद्व बढ़ा और वर्ष 2018 से 2022 के बीच 17 लोगों की मौत हो गई।
छह मौतें तों 2021 में हुईं, उसके बाद 2022 में पांच मौतें हुईं। इसी वर्ष, सीधी और सिंगरौली में दो लोग हताहत हुए। वर्ष 2023 में अनपूपुर में हाथियों ने तीन लोगों की जान ली और वर्ष 2024 में उमरिया और अनूपपुर में एक-एक कर दो लोगों की मौत हुई। इसके अलावा भी कुछ और घटनाएं हुईं।
झुंड में शामिल किसी जंगली हाथी के अलग होने और मतवाला हो जाने पर उसका रेस्क्यू करना भी आसान काम नहीं है। हालांकि बांधवगढ़ की टीम ने पांच जंगली हाथियों का रेस्क्यू किया है। इनमें से तीन का वर्ष 2019 में सीधी जिले से, अनपूपुर और उमरिया जिले में एक-एक हाथी का वर्ष 2024 फरवरी और मार्च में रेस्क्यू किया गया।
इनमें से चार हाथी बांधवगढ़ में जबकि एक को कान्हा नेशनल पार्क भेज दिया गया था, जिन्हें बाद में हाई कोर्ट के आदेश से खुले जंगल में छोड़ दिया गया। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ शुभरंजन सेन बताते हैं कि हाथी समस्या का समाधान निकालने के लिए सरकार ने समिति गठित की है।
इस समिति ने वर्ष 2023 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें हाथी प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने पर विशेष जोर दिया गया था, ताकि बाघ की तरह हाथियों के साथ भी ग्रामीण मैत्री भाव से रह सकें।