डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी (सेवानिवृत्त) का निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और देहरादून के मैक्स अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे।
मंगलवार सुबह करीब 11:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से उत्तराखंड समेत पूरे राजनीतिक जगत में शोक की लहर है।
दो बार संभाली उत्तराखंड की कमान
भुवन चंद्र खंडूड़ी 2007 से 2009 और फिर 2011 से 2012 तक दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। अपने सख्त प्रशासन, साफ-सुथरी छवि और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के कारण उन्हें उत्तराखंड की राजनीति में अलग पहचान मिली। उनकी बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी वर्तमान में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष हैं।
सेना से राजनीति तक का सफर
सेना से मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद खंडूड़ी ने राजनीति में कदम रखा। वह पहली बार 1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद कई बार संसद पहुंचे और भाजपा के मजबूत पहाड़ी चेहरे के रूप में स्थापित हुए।
वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके कार्यकाल में देश में सड़क नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम उठाए गए। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को प्रभावी तरीके से लागू कराने में उनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। दूरदराज के गांवों तक सड़क पहुंचाने की उनकी प्रशासनिक क्षमता और सख्ती को आज भी याद किया जाता है।
‘कड़क मुख्यमंत्री’ के रूप में बनी पहचान
2007 में उत्तराखंड में भाजपा सरकार बनने के बाद खंडूड़ी पहली बार मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल अनुशासन, पारदर्शिता और कठोर प्रशासन के लिए जाना गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्त कार्यशैली के कारण उन्हें ‘कड़क मुख्यमंत्री’ कहा जाने लगा।
हालांकि उनकी सख्ती कई नेताओं और विधायकों को असहज भी करती रही। 2009 लोकसभा चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में 2011 में पार्टी ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया।
ईमानदारी रही सबसे बड़ी पहचान
राजनीति में समझौतों और आरोपों के दौर के बीच भुवन चंद्र खंडूड़ी अपनी ईमानदार और बेदाग छवि के लिए जाने जाते थे। अफसरशाही पर नियंत्रण, विकास कार्यों में गुणवत्ता और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर उनका रवैया बेहद कठोर माना जाता था। उनके राजनीतिक विरोधी भी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा सके।
चुनावी हार के बाद भी कायम रहा सम्मान
2012 विधानसभा चुनाव में उन्हें कोटद्वार सीट से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जनता के बीच उनका सम्मान बरकरार रहा। 2014 में वह एक बार फिर गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्होंने बाद के वर्षों में सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।
उत्तराखंड ने खोया अनुशासन और सादगी का प्रतीक
भुवन चंद्र खंडूड़ी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि सादगी, ईमानदारी और प्रशासनिक दृढ़ता की मिसाल थे। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद की राजनीति में उनकी भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण मानी जाएगी। उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने ऐसा जननेता खो दिया, जिसकी पहचान सत्ता से ज्यादा सिद्धांतों, अनुशासन और स्वच्छ राजनीति से थी।