
डिजिटल डेस्क, नईदुनिया। गुजरात हाईकोर्ट ने विवाह की वैधता को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार हिंदू रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं के बिना किया गया विवाह केवल पंजीकरण प्रमाण पत्र के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।
ब्रिटेन में रहने वाले एक प्रवासी भारतीय युवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उसके कथित विवाह को शून्य घोषित कर दिया। जज इलेश जे वोरा और न्यायमूर्ति आर टी वाच्छानी की खंडपीठ ने अपने दस पन्नों के आदेश में यह स्पष्ट किया कि विवाह प्रमाण पत्र तभी मान्य होता है, जब विवाह पहले विधि-विधान और आवश्यक रस्मों के अनुसार संपन्न हुआ हो।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8 के तहत जारी किया गया विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र केवल उस विवाह का प्रमाण होता है, जो पहले से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हो चुका हो।
सिर्फ विवाह का पंजीकरण करा लेने और प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेने से विवाह की कानूनी वैधता साबित नहीं होती। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह में धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का पालन आवश्यक है।
यह मामला यूनाइटेड किंगडम (यूके) में रहने वाले एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था। इससे पहले फैमिली कोर्ट ने उस व्यक्ति और एक महिला के बीच कथित विवाह को अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद युवक ने गुजरात हाई कोर्ट में अपील की।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसे इस कथित विवाह की जानकारी तब मिली, जब एक महिला उसके माता-पिता के पास विवाह प्रमाण पत्र लेकर पहुंची और खुद को उसकी कानूनी पत्नी बताया।
युवक ने दावा किया कि उसने महिला से कभी विवाह नहीं किया था। दोनों कभी पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रहे और उनके बीच किसी तरह की विवाह रस्म भी नहीं हुई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि वह महिला के पिता की कंपनी में काम करता था। इसी दौरान उसे नौकरी में पदोन्नति का लालच दिया गया या नौकरी से हटाने की धमकी देकर विवाह से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए।
सुनवाई के दौरान महिला ने लिखित जवाब में स्वीकार किया कि दोनों के बीच कोई विवाह समारोह या हिंदू विवाह की आवश्यक रस्में आयोजित नहीं हुई थीं। उसने यह भी माना कि दोनों के बीच विधिवत विवाह नहीं हुआ था और कोई वैवाहिक संबंध भी स्थापित नहीं हुए। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने विवाह प्रमाण पत्र के आधार पर मामले की विस्तृत सुनवाई की जरूरत बताई थी और विवाह को अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था।
गुजरात हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब महिला स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि हिंदू विवाह के लिए जरूरी रस्में पूरी नहीं हुईं, तो दोनों पक्षों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य करने का कोई कारण नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर कथित विवाह को शून्य घोषित कर दिया।