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डिजिटल डेस्क, नईदिल्ली। भारतीय रेलवे ने अपने 173 साल के इतिहास (Indian Railways History) में तकनीक के क्षेत्र में कई बड़े बदलाव देखे हैं। स्टीम इंजन से शुरू हुआ यह सफर डीजल और इलेक्ट्रिक इंजनों तक पहुंचा और अब देश हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेनों के युग में प्रवेश कर चुका है। भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन की शुरुआत के साथ रेलवे ने स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है।
शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पहली हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह ट्रेन हरियाणा में नॉर्दर्न रेलवे के तहत 89 किलोमीटर लंबे जींद-सोनीपत रेलखंड पर संचालित होगी। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन ईंधन से ट्रेनें चलाई जा रही हैं।
भारतीय रेलवे की शुरुआत 16 अप्रैल 1853 को हुई थी। इसी दिन देश की पहली पैसेंजर ट्रेन ने मुंबई के बोरी बंदर स्टेशन से अपनी पहली व्यावसायिक यात्रा शुरू की थी। आज बोरी बंदर स्टेशन को छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के नाम से जाना जाता है।
उस समय इस ट्रेन का संचालन ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (GIPR) द्वारा किया जाता था। बाद में वर्ष 1900 में GIPR का इंडियन मिडलैंड रेलवे कंपनी में विलय कर दिया गया।
पहली ट्रेन ने बोरी बंदर से थाणे तक लगभग 35 किलोमीटर की दूरी 57 मिनट में पूरी की थी। इस ट्रेन में 14 यात्री डिब्बे थे और इसे तीन स्टीम लोकोमोटिव सुल्तान, सिंध और साहिब खींच रहे थे। यही भारतीय रेलवे के स्टीम इंजन युग की शुरुआत थी।
20वीं सदी में दुनिया के कई देशों ने स्टीम इंजन की जगह अधिक आधुनिक डीजल इंजन अपनाने शुरू किए। भारत ने भी 1950 और 1960 के दशक में इस दिशा में कदम बढ़ाया।
डीजल लोकोमोटिव में डीजल ईंधन और इंटरनल कंबशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे कोयले पर निर्भरता और भारी शारीरिक श्रम में कमी आई। डीजल इंजन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इनमें स्टीम इंजन की तुलना में कम रखरखाव की जरूरत पड़ती थी। साथ ही ये लंबी दूरी तक बिना दोबारा ईंधन भरे चल सकते थे और अधिक शक्ति के कारण तेज गति भी पकड़ते थे।
भारतीय रेलवे ने 1950 के दशक के अंतिम वर्षों में अमेरिका की अमेरिकन लोकोमोटिव कंपनी (ALCo) से डीजल लोकोमोटिव की पहली खेप मंगाई। इसके बाद 1960 के दशक में WDM-2 डीजल इंजन को पेश किया गया, जिसे ALCO के सहयोग से विकसित किया गया था।
यह इंजन यात्री और मालगाड़ियों दोनों के संचालन की रीढ़ बन गया। इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन से भारतीय रेलवे में स्टीम इंजन से डीजल इंजन की ओर बदलाव की प्रक्रिया तेज हो गई।
जैसे-जैसे तेज, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की जरूरत बढ़ी, भारतीय रेलवे ने इलेक्ट्रिक इंजनों को अपनाना शुरू किया।
मुंबई क्षेत्र में 1920 के दशक में ही रेलवे लाइनों का विद्युतीकरण शुरू हो गया था। देश की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन वर्ष 1925 में बॉम्बे विक्टोरिया टर्मिनस (अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) और कुर्ला के बीच चलाई गई।
इलेक्ट्रिक इंजन पेंटोग्राफ नामक उपकरण के माध्यम से ओवरहेड तारों से बिजली प्राप्त करते हैं। ये इंजन अपेक्षाकृत शांत होते हैं, धुआं नहीं छोड़ते और संचालन में अधिक दक्ष माने जाते हैं।
हालांकि बड़े पैमाने पर रेलवे का विद्युतीकरण 1980 के दशक के बाद तेजी से बढ़ा। वर्ष 1985 से भारतीय रेलवे ने धीरे-धीरे स्टीम इंजनों को सेवा से हटाना शुरू किया और डीजल तथा इलेक्ट्रिक इंजनों पर आधारित संचालन को प्राथमिकता दी। इससे परिचालन लागत में कमी, गति में वृद्धि और क्षमता में विस्तार जैसे कई लाभ मिले।
भारतीय रेलवे ने वर्ष 2030 तक 'नेट जीरो कार्बन उत्सर्जक' बनने का लक्ष्य तय किया है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए रेलवे लगातार गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ा रहा है।
रेल नेटवर्क के बड़े हिस्से का विद्युतीकरण किया जा चुका है, जिससे डीजल की खपत में लगातार कमी आ रही है। साथ ही रेलवे अपने संचालन को और अधिक डी-कार्बोनाइज करने के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रहा है।
इसी दिशा में भारत ने अब हाइड्रोजन ईंधन आधारित ट्रेन सेवा की शुरुआत की है। हरियाणा के जींद-सोनीपत रेलखंड पर शुरू हुई यह ट्रेन भारतीय रेलवे के तकनीकी विकास का नया अध्याय मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुक्रवार को हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई इस ट्रेन के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने हाइड्रोजन आधारित रेल तकनीक को अपनाया है।
स्टीम इंजन से शुरू हुआ भारतीय रेलवे का सफर अब हाइड्रोजन-पावर्ड तकनीक तक पहुंच चुका है। यह बदलाव केवल तकनीकी विकास का प्रतीक नहीं है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य के टिकाऊ परिवहन की दिशा में भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।