एक योद्धा ऐसा भी... देश के लिए काट दिया था अपने मामा का सिर! रणभूमि में देख भाग खड़े होते थे मुगल
भारतीय इतिहास में वीरता की जब भी बात होती है, अहोम साम्राज्य के सेनापति लचित बोरफुकन का नाम गर्व से लिया जाता है। ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 09 Apr 2026 05:23:11 PM (IST)Updated Date: Thu, 09 Apr 2026 05:23:11 PM (IST)
एक योद्धा ऐसा भी... देश के लिए काट दिया था अपने मामा का सिरHighLights
- लचित बोरफुकन ने राष्ट्र रक्षा के लिए काम में ढिलाई पर अपने मामा का सिर काटा
डिजिटल डेस्क। भारतीय इतिहास में वीरता की जब भी बात होती है, अहोम साम्राज्य के सेनापति लचित बोरफुकन का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्होंने न केवल मुगलों की विशाल सेना को धूल चटाई, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि राष्ट्र की सुरक्षा के सामने पारिवारिक संबंध गौण हैं।
कौन थे लचित बोरफुकन?
लचित बोरफुकन का जन्म 24 नवंबर 1622 को असम के प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान गुवाहाटी) में हुआ था। उनके पिता मोमाई तामुली बोरबरुआ अहोम साम्राज्य के एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे।
सैन्य निपुणता: युद्ध कला और रणनीतियों में माहिर लचित को अहोम राजा चक्रध्वज सिंहा ने 'बोरफुकन' (सेनापति) की उपाधि के साथ कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया।
प्रमुख उपलब्धियां: उन्हें सोलाधर बोरुआ और सिमुलगढ़ किले के कमांडर जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।
"देश से बड़ा कोई सगा नहीं": जब मामा पर चली तलवार
इतिहास का यह किस्सा लचित बोरफुकन के कठोर अनुशासन और राष्ट्रभक्ति को दर्शाता है। मुगलों के आक्रमण की आहट के बीच, गुवाहाटी के पास रात भर में एक सुरक्षा दीवार (मिट्टी का तटबंध) बनाना अनिवार्य था।
जिम्मेदारी: लचित ने इस कार्य का नेतृत्व अपने सगे मामा को सौंपा था।
निर्णायक कदम: जब आधी रात को लचित निरीक्षण करने पहुंचे, तो काम में ढिलाई और मजदूरों को सुस्त पाया। जब उनके मामा ने थकान का बहाना बनाया, तो लचित ने गरजते हुए कहा- "मेरे मामा देश से बड़े नहीं हो सकते।" उन्होंने मौके पर ही अपने मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस कठोर कार्रवाई ने सैनिकों में ऐसा भय और जोश भरा कि वह दीवार सुबह होने से पहले ही बनकर तैयार हो गई।
सरायघाट का युद्ध: बीमार शरीर, लेकिन फौलादी इरादे
1671 में हुआ सरायघाट का युद्ध लचित की रणनीतिक जीत का चरमोत्कर्ष था।
- चुनौती: मुगल सेनापति राम सिंह के पास विशाल नौसेना और पैदल सैनिक थे। युद्ध के समय लचित गंभीर रूप से बीमार थे और डॉक्टरों ने उन्हें आराम की सलाह दी थी।
- वीरता: बीमारी की हालत में भी लचित नाव पर सवार होकर युद्ध के मैदान में उतरे। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा, "यदि आप भागना चाहते हैं, तो भागें, लेकिन मैं मरते दम तक लड़ूंगा।"
उनकी इस हुंकार ने अहोम सेना में जान फूंक दी और मुगलों को मानस नदी के पार खदेड़ दिया गया।
यह भी पढ़ें- किसानों के लिए बड़ी खबर... एमपी में 9 अप्रैल से शुरू होगी गेहूं की खरीदी, सीएम ने बदला शेड्यूल और दिए कड़े निर्देश