
डिजिटल डेस्क नई दिल्ली। 25 जुलाई 2026 की दोपहर 2:18 बजे देश की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिला। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में यह दूसरा इस्तीफा है, लेकिन जन आंदोलन के दबाव में हुआ यह पहला मंत्रीस्तरीय इस्तीफा माना जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2018 में एमजे अकबर ने #MeToo आंदोलन के दौरान इस्तीफा दिया था।
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश में कई बड़े आंदोलन और विवाद हुए, लेकिन सरकार ने कभी किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार को कई बड़े जन आंदोलनों का सामना करना पड़ा।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ शाहीन बाग से लेकर देश के कई हिस्सों तक महीनों प्रदर्शन हुए। विपक्ष लगातार कानून वापस लेने और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन केंद्र सरकार अपने फैसले पर कायम रही। उस दौरान किसी केंद्रीय मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया।
इसके बाद तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुआ। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों किसान करीब एक वर्ष तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। हालांकि उस पूरे आंदोलन के दौरान भी किसी केंद्रीय मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया।
अग्निपथ योजना को लेकर कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए। रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों को नुकसान पहुंचाया गया, लेकिन सरकार ने योजना वापस नहीं ली। इसी तरह कोविड-19 प्रबंधन, बेरोजगारी, महंगाई, मणिपुर हिंसा और पहलवानों के आंदोलन जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा, लेकिन किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ।
यही वजह है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राजनीतिक रूप से अलग महत्व रखता है और इसकी तुलना पिछले 12 वर्षों के आंदोलनों से की जा रही है।
इस्तीफे के बीच सरकार ने प्रशासनिक व विधायी स्तर पर कार्रवाई तेज कर दी है:
लोक परीक्षा संशोधन विधेयक: सूत्रों के अनुसार, सरकार सोमवार को संसद में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश कर सकती है। इसका उद्देश्य पेपर लीक पर सख्त प्रावधान लागू करना है।
फाष्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत: राउज एवेन्यू कोर्ट परिसर में विशेष फास्ट ट्रैक अदालत ने कार्यभार संभाल लिया है। विशेष न्यायाधीश अनु ग्रोवर बलिगा की अध्यक्षता वाली इस अदालत में NEET UG 2026 पेपर लीक से जुड़े 13 आरोपियों का मुकदमा स्थानांतरित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों के अनुसार, इस इस्तीफे के पीछे 5 प्रमुख कारण हैं:
1. 'नैरेटिव कंट्रोल' का छिन जाना
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत जमीनी माहौल को समझकर नैरेटिव को अपने पक्ष में करना रही है। लेकिन NEET विरोध को शुरुआती दौर में 'ऑनलाइन मजाक' समझना भारी पड़ा। सोनम वांगचुक के अनशन और पुलिस कार्रवाई के वीडियो ने सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश पैदा कर दिया।
2. Gen Z की सीधी चुनौती
सरकार इस आंदोलन को पारंपरिक टैग्स जैसे 'सिख अलगाववादी' या 'विदेशी साजिश' से नहीं जोड़ सकी। आंदोलन करने वाले देश के पढ़े-लिखे, मध्यमवर्गीय युवा थे, जो सीधे तौर पर अपने भविष्य के लिए जवाब मांग रहे थे।
3. अंदरूनी सियासी दबाव
धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा में बीजेपी के 20 सांसदों के प्रमुख चेहरे थे। उन्होंने 22 जुलाई को इन सांसदों के साथ तस्वीर पोस्ट कर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया था। लोकसभा में NDA के पास 298 सीटें हैं (बहुमत से 26 अधिक), ऐसे में पार्टी के अंदरूनी गलियारों की दरार ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया।
4. विपक्ष का आक्रामक रुख
राहुल गांधी ने 21 जुलाई को PM आवास के बाहर धरना देकर तीन प्रमुख मांगें रखीं: प्रधान का इस्तीफा, पुलिस कार्रवाई की जांच और प्रधानमंत्री की माफी। CJP और विपक्ष के संयुक्त दबाव ने सरकार के पास कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा।
5. RSS का 'संवाद' का संदेश
25 जुलाई को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, "अब वह समय नहीं है जब मां-बाप कहें और बच्चे चुप रहें। नई पीढ़ी सवाल पूछती है। अब हुक्म नहीं, संवाद करना होगा।" विश्लेषकों ने इसे सरकार के लिए आंदोलनकारियों के सामने झुकने का सीधा संकेत माना।