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जब छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तब लोकतंत्र को खुद से सवाल पूछने पड़ते हैं

लेख छात्र आंदोलनों के इतिहास और वर्तमान संकट के बीच गहरा संबंध स्थापित करता है।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 06:26:56 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 06:26:56 PM (IST)
जब छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तब लोकतंत्र को खुद से सवाल पूछने पड़ते हैं
नीट पेपर लीक विवाद ने देशभर में छात्रों के आक्रोश को नई दिशा दी है

HighLights

  1. छात्रों का आंदोलन लोकतंत्र में जवाबदेही की मांग बना
  2. पेपर लीक से लाखों विद्यार्थियों का भरोसा डगमगाया
  3. इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बदलावों की नींव रखी

मनोज दुबे, नई दिल्ली। किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसके युवा होते हैं। यही युवा जब किताबें छोड़कर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र और शासन व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है। आज नीट पेपर लीक को लेकर देशभर में उठ रही छात्रों की आवाज इसी आत्ममंथन की मांग कर रही है।

दिल्ली में 'चलो संसद' मार्च के दौरान छात्रों पर हुए बल प्रयोग की तस्वीरों ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को जीवित कर दिया कि आखिर देश का छात्र बार-बार सड़क पर क्यों उतरता है? क्या उसकी आवाज इतनी कमजोर है कि उसे सुनाने के लिए प्रदर्शन करना ही एकमात्र विकल्प बचता है? या फिर व्यवस्था इतनी दूर हो चुकी है कि संवाद की जगह टकराव ने ले ली है?


नीट केवल एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों परिवारों के सपनों, वर्षों की मेहनत और आर्थिक संघर्ष का प्रतीक है। देश के छोटे कस्बों और गांवों से आने वाले विद्यार्थी अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण साल एक परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं। माता-पिता अपनी बचत खर्च कर देते हैं, कई परिवार कर्ज तक ले लेते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो टूटता केवल एक परिणाम नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भरोसा भी होता है, जिस पर भविष्य टिका होता है।

यह पहला अवसर नहीं है जब छात्र अपनी आवाज लेकर सड़कों पर आए हैं। भारतीय इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने अन्याय या व्यवस्था की खामियों के खिलाफ संघर्ष किया, तब-तब राजनीति की दिशा बदली है। स्वतंत्रता आंदोलन में छात्रों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर लड़ाई लड़ी। 1955 में बिहार का छात्र आंदोलन सरकार को झुकाने में सफल रहा। गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ जनक्रांति बना। 1974 का जेपी आंदोलन केवल छात्र आंदोलन नहीं रहा, बल्कि उसने भारतीय लोकतंत्र की पूरी राजनीतिक धारा बदल दी। असम आंदोलन ने भी दिखाया कि छात्र केवल विरोध नहीं करते, वे समाज और राजनीति के एजेंडे को भी प्रभावित करते हैं।

इतिहास यह भी सिखाता है कि हर छात्र आंदोलन सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं होता। अधिकांश आंदोलनों की शुरुआत किसी एक वास्तविक समस्या से होती है। कहीं फीस बढ़ोतरी, कहीं परीक्षा में गड़बड़ी, कहीं भ्रष्टाचार और कहीं अवसरों की असमानता। यदि इन समस्याओं को समय रहते गंभीरता से सुना जाए, तो आंदोलन अक्सर संवाद में बदल जाते हैं। लेकिन जब उपेक्षा होती है, तब असंतोष व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लेता है।

नीट विवाद भी उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। यह केवल पेपर लीक का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल उस भरोसे का है, जो हर प्रतियोगी परीक्षा की नींव होता है। यदि छात्र को यह विश्वास नहीं रहेगा कि उसकी सफलता केवल उसकी मेहनत पर निर्भर है, तो पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाएगी। किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा संकट शायद ही कोई हो सकता है।

सरकार के लिए यह समय केवल प्रशासनिक कार्रवाई का नहीं, बल्कि विश्वास बहाल करने का है। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जहां भविष्य में इस तरह की घटनाओं की संभावना न्यूनतम हो। परीक्षा प्रणाली जितनी पारदर्शी और जवाबदेह होगी, उतना ही मजबूत युवाओं का भरोसा होगा।

विपक्ष की भी समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में जनभावनाओं को उठाना उसका अधिकार है, लेकिन छात्रों के भविष्य को केवल राजनीतिक हथियार बना देना किसी भी पक्ष के हित में नहीं होगा। संसद में बहस हो, सड़क पर विरोध हो या न्यायालय में सुनवाई, हर मंच का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, केवल टकराव नहीं।

भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यही युवा आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था, विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन और लोकतंत्र की दिशा तय करेंगे। यदि यही पीढ़ी व्यवस्था पर भरोसा खोने लगे, तो इसका प्रभाव केवल एक सरकार या एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि यह राष्ट्र की विकास यात्रा को प्रभावित करेगा।

लोकतंत्र की खूबसूरती केवल चुनावों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह अपने युवाओं की आवाज कितनी गंभीरता से सुनता है। छात्र जब सड़क पर उतरते हैं, तो वे केवल नारे नहीं लगाते बल्कि वे व्यवस्था को आईना दिखाते हैं। उस आईने को तोड़ देना आसान है, लेकिन उसमें दिख रही सच्चाई से आंखें चुराना किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।

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आज आवश्यकता आंदोलन और शक्ति प्रदर्शन से अधिक विश्वास बहाली की है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य तब सुरक्षित होता है, जब उसकी युवा पीढ़ी को यह भरोसा हो कि उसकी मेहनत का मूल्य मिलेगा, उसकी आवाज सुनी जाएगी और उसका सपना किसी लापरवाही, भ्रष्टाचार या अव्यवस्था की भेंट नहीं चढ़ेगा। यही भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी अव्यस्था के खिलाफ उठी आवाज का एक उदाहरण है।