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डिजिटल डेस्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी समारोह के अवसर पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ के सर्वोच्च पद को लेकर एक बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। मुंबई में आयोजित एक व्याख्यानमाला के दौरान उन्होंने कहा कि संघ प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने के लिए किसी खास जाति का होना जरूरी नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या एससी-एसटी समाज का कोई भी व्यक्ति सरसंघचालक बन सकता है।
कार्यक्रम में बातचीत के दौरान भागवत ने एक सवाल के जवाब में कहा, "संघ में इस आधार पर कार्यकर्ता नियुक्त नहीं होते कि उनकी जाति क्या है। जो हिंदू है, वह सरसंघचालक बन सकता है। हमारे यहाँ काम करने वाले को जिम्मेदारी मिलती है। एससी/एसटी वर्ग का व्यक्ति भी इस पद पर पहुँच सकता है। सिर्फ ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है और किसी अन्य जाति का होना कोई अयोग्यता नहीं।"
संघ की पुरानी छवि पर चर्चा करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि जब संघ की शुरुआत हुई थी, तब वह एक छोटी सी ब्राह्मण बस्ती से शुरू हुआ था। उन्होंने स्वीकार किया, "शुरुआती दौर में संघ छोटा था और एक ब्राह्मण बहुल बस्ती में सक्रिय था, इसलिए स्वाभाविक रूप से पदाधिकारी ब्राह्मण थे। इसी वजह से लोग कहने लगे कि संघ ब्राह्मणों का है और कुछ लोग आज भी यही कहते हैं, क्योंकि वे केवल जाति देखते हैं। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।"
संघ प्रमुख ने विस्तार की रणनीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि अब संघ का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।
भागवत ने अंत में कहा कि आज संघ के अखिल भारतीय स्तर के नेतृत्व में केवल एक जाति के लोग नहीं हैं, बल्कि सभी जातियों का प्रतिनिधित्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में यह समावेशिता स्वाभाविक रूप से आई है, जहाँ पद का आधार केवल समर्पण और कार्यक्षमता है।