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'आपने गरीब बच्ची का इलाज नहीं किया, नाम से डॉक्टर हटा लो...', 4 वर्षीय मासूम रेप पीड़िता की मौत पर अस्पतालों पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

गाजियाबाद में 4 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को समय पर इलाज न मिलने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो निजी अस्पतालों और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Fri, 17 Jul 2026 03:30:44 PM (IST)Updated Date: Fri, 17 Jul 2026 03:30:44 PM (IST)
'आपने गरीब बच्ची का इलाज नहीं किया, नाम से डॉक्टर हटा लो...', 4 वर्षीय मासूम रेप पीड़िता की मौत पर अस्पतालों पर भड़का सुप्रीम कोर्ट
गाजियाबाद रेप पीड़िता केस: सुप्रीम कोर्ट की अस्पतालों को फटकार (फाइल फोटो)

HighLights

  1. इलाज से इनकार पर गंभीर सवाल उठे
  2. पुलिस की कार्रवाई पर भी कोर्ट नाराज
  3. अस्पतालों को परिवार को दान का निर्देश

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। गाजियाबाद में 4 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को समय पर इलाज नहीं मिलने के मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दो निजी अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अस्पतालों ने बच्ची की गरीबी को देखते हुए उसके इलाज में संवेदनहीनता दिखाई और उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक प्रयास नहीं किए।

घटना के बाद अस्पतालों ने भर्ती से किया इनकार

यह मामला 16 मार्च का है। आरोप है कि पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति चॉकलेट दिलाने का लालच देकर 4 वर्षीय बच्ची को अपने साथ ले गया। काफी देर तक बच्ची के घर नहीं लौटने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। बाद में बच्ची पास ही बेहोशी की हालत में खून से लथपथ मिली।


परिजन उसे इलाज के लिए दो निजी अस्पतालों में लेकर पहुंचे, लेकिन दोनों अस्पतालों ने कथित तौर पर उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। इसके बाद बच्ची को गाजियाबाद के जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

CJI बोले- डॉक्टर कहलाने का अधिकार नहीं

सुनवाई के दौरान बच्ची के पिता ने दावा किया कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उनकी बेटी लगभग दो घंटे तक जीवित थी। उनका कहना था कि यदि समय पर इलाज मिल जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT ने भी अपनी रिपोर्ट में माना कि बच्ची को समय पर जरूरी चिकित्सा सुविधा नहीं मिली।

इस पर CJI सूर्यकांत ने अस्पताल प्रबंधन से कहा कि यदि डॉक्टर अपना मूल कर्तव्य नहीं निभाते, तो उन्हें अपने नाम के साथ "डॉक्टर" लिखने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि अस्पताल में आवश्यक सुविधा नहीं थी तो बच्ची को तत्काल किसी अन्य अस्पताल भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए थी। अदालत ने टिप्पणी की कि बच्ची की गरीबी को देखते हुए उसके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया गया।

पुलिस की भूमिका पर भी उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। अदालत के अनुसार, घटना की सूचना मिलने के बावजूद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई नहीं की और परिजनों के साथ मारपीट के आरोप भी सामने आए। बाद में 17 मार्च को एफआईआर दर्ज हुई और 18 मार्च को आरोपी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन शुरुआती एफआईआर में POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 376 का उल्लेख नहीं था।

कोर्ट ने अस्पतालों को दंडस्वरूप पीड़ित परिवार को स्वैच्छिक दान देने का निर्देश दिया और आदेश का पालन नहीं करने पर जुर्माना लगाने की चेतावनी भी दी। साथ ही अदालत ने कहा कि इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू निजी अस्पतालों और स्थानीय पुलिस की पूर्ण उदासीनता रही।