
डिजिटल डेस्क। दहेज उत्पीड़न और विवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से जुड़े एक गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ी और तल्ख टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शादी के बाद लड़कियों और उनके माता-पिता का अपमान करना भारतीय समाज में एक बड़ी और गंभीर बीमारी बन चुका है। अदालत ने साफ किया कि इस तरह के मामलों में समाज को एक बहुत ही सख्त और स्पष्ट संदेश देना बेहद जरूरी है।
यह ऐतिहासिक टिप्पणी जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने छत्तीसगढ़ के एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान की। यह मामला वर्ष 2010 का है, जिसमें शादी के महज तीन साल के भीतर एक महिला की ससुराल में फांसी के फंदे से लटकने के कारण संदिग्ध मौत हो गई थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने ससुराल पक्ष की मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, 'लड़के आखिर शादी क्यों करते हैं? जब शादी कर ली है, तो फिर लड़की और उसके परिवार को क्यों अपमानित करते हैं? अब समाज में यह कड़ा संदेश जाना ही चाहिए कि बहू और उसके मायके वालों का अपमान किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।'
अदालत ने आगे कहा कि यह मामला सिर्फ एक सामान्य आत्महत्या का नहीं है, बल्कि इसके पीछे लगातार दी जा रही मानसिक, शारीरिक और आर्थिक प्रताड़ना है।
रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने भारी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ससुराल वालों द्वारा लड़की के परिवार को 'भिखारी' तक कहा गया और उनसे लगातार पैसों की उगाही की कोशिश की गई। कोर्ट ने भावुक होते हुए कहा कि लड़की के पिता अपनी बेटी की जान और घर बचाने के लिए हर मुमकिन आर्थिक मदद देने को तैयार थे, लेकिन इसके बावजूद उनके साथ लगातार बदसलूकी और अपमान किया गया।
याचिकाकर्ता (आरोपी देवर) की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि एफआईआर (FIR) दर्ज कराने में देरी हुई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीकी दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। मामले पर चिंता जताते हुए बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस उज्जल भुइयां ने टिप्पणी की कि सबसे ज्यादा हैरानी और दुख की बात यह है कि इस तरह के घिनौने और अमानवीय मामलों में समाज के पढ़े-लिखे लोग भी शामिल पाए जा रहे हैं।
यह याचिका मृतका के देवर की तरफ से दायर की गई थी, जिसने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए (घरेलू क्रूरता) के तहत निचली अदालत द्वारा मिली सजा को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकील ऋषि जायसवाल ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर केवल प्रताड़ना के आरोप हैं, इसलिए राहत दी जाए।
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने दोटूक लहजे में कहा, 'आपको तो खुश होना चाहिए कि आप पर सिर्फ धारा 498ए लगी है और केवल तीन साल की सजा हुई है।' इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के दोषियों को सजा देने के फैसले को बिल्कुल सही ठहराते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।