धर्म डेस्क। दुनिया भर में फैले माता सती के 51 शक्तिपीठों में से कुछ आज भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर हैं। इन्हीं में से एक सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक शक्तिपीठ है 'हिंगलाज माता मंदिर'।
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लसबेला जिले में स्थित यह मंदिर न केवल हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम सद्भाव की एक अनूठी मिसाल भी पेश करता है।
क्यों खास है हिंगलाज शक्तिपीठ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब इस दुर्गम स्थान पर माता का 'ब्रह्मरंध्र' (सिर का ऊपरी हिस्सा) गिरा था।
यहाँ माता को 'कोट्टवीशा' और उनके साथ विराजमान भगवान शिव के स्वरूप को 'भीमलोचन' के नाम से पूजा जाता है।
यह सिद्ध पीठ लगभग 2000 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में है। मान्यता है कि त्रेता युग में स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी यहाँ की यात्रा की थी।
'नानी की हज' या 'बीबी नानी पीर'
हिंगलाज माता का यह दरबार सरहद पार सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है। स्थानीय मुस्लिम समुदाय भी इस मंदिर के प्रति गहरी श्रद्धा रखता है।
मुस्लिम मान्यता - स्थानीय लोग इसे 'नानी की हज' या 'बीबी नानी पीर' के नाम से पुकारते हैं।
सालाना मेला - हर साल अप्रैल के महीने में कराची से एक भव्य वार्षिक तीर्थ यात्रा शुरू होती है, जिसमें हजारों हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु शामिल होते हैं।
दुर्गम गुफा में विराजती हैं भवानी
यह मंदिर किसी भव्य इमारत में नहीं, बल्कि ऊँची पहाड़ियों की तलहटी में स्थित एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। मंदिर तक पहुँचने का रास्ता बेहद कठिन और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों से होकर गुजरता है, लेकिन भक्तों का विश्वास उन्हें यहाँ तक खींच लाता है।
दुर्गा चालीसा में उल्लेख
इस शक्तिपीठ की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका वर्णन पवित्र 'दुर्गा चालीसा' में भी मिलता है।
प्रमुख आकर्षण और उत्सव
सालाना तीर्थ यात्रा - अप्रैल माह में होने वाली इस यात्रा में पाकिस्तान के कोने-कोने से लोग जुटते हैं।
नवरात्र उत्सव - चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहाँ विशेष अनुष्ठान होते हैं, जहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
प्राकृतिक सौंदर्य - पहाड़ों और मरुस्थलीय इलाके के बीच स्थित यह गुफा मंदिर अपने शांत और दिव्य वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
हिंगलाज माता शक्तिपीठ न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह उस साझी विरासत का गवाह है जो देशों की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता और श्रद्धा को जोड़ती है।