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आंखों की रोशनी होने के बाद भी गांधारी ने क्यों बांधी थी पट्टी? इस एक वचन ने बदल दिया पूरे महाभारत का इतिहास

गांधारी के बारे में यह बात सभी जानते हैं कि वे हमेशा अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर रखती थीं। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आंखों की पूरी...और पढ़ें

By Himadri Singh HadaEdited By: Himadri Singh Hada
Publish Date: Wed, 01 Jul 2026 02:59:22 PM (IST)Updated Date: Wed, 01 Jul 2026 02:59:22 PM (IST)
आंखों की रोशनी होने के बाद भी गांधारी ने क्यों बांधी थी पट्टी? इस एक वचन ने बदल दिया पूरे महाभारत का इतिहास

धर्म डेस्क। धार्मिक ग्रंथों में महाभारत की कथा का एक विशेष स्थान है। इस महाकाव्य में कई ऐसे पात्र हैं, जिनका चरित्र अत्यंत अनोखा और प्रेरणादायी रहा है। इन्हीं में से एक मुख्य पात्र थीं माता गांधारी। गांधारी के बारे में यह बात सभी जानते हैं कि वे हमेशा अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर रखती थीं।

लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आंखों की पूरी रोशनी होने के बावजूद उन्होंने आजीवन अंधकार में रहने का फैसला क्यों किया? आइए जानते हैं इसके पीछे की मुख्य वजह।

आजीवन पट्टी बांधने का संकल्प

गांधार नरेश की पुत्री गांधारी अत्यंत सुंदर, विदुषी और परम शिव भक्त थीं। जब भीष्म पितामह ने धृतराष्ट्र के लिए उनका हाथ मांगा, तब गांधार नरेश हस्तिनापुर की सैन्य शक्ति के आगे विवश थे और उन्होंने इस विवाह के लिए हामी भर दी। विवाह के बाद जब गांधारी को पता चला कि उनके पति धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे हैं, तो उन्होंने इसका विद्रोह करने के बजाय इसे ही अपना भाग्य मान लिया।


पति के प्रति आदर और निष्ठा भाव रखते हुए उन्होंने संकल्प लिया कि 'जो संसार मेरे स्वामी नहीं देख सकते, उसे देखने का अधिकार मुझे भी नहीं है।' गांधारी का यह कदम उनके पतिव्रता धर्म और संसार को पति की दृष्टि से देखने के संकल्प का प्रतीक बना। इसी वजह से वे आजीवन आंखों पर पट्टी बांधकर रहीं।

कठिन शिव आराधना से मिला था एक विशेष वरदान

धृतराष्ट्र से विवाह के बाद गांधारी 100 पुत्रों की माता बनीं, जिनमें सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन था। गांधारी ने अपनी आंखों की पट्टी को कभी नहीं खोला। उनकी कठिन शिव आराधना से उन्हें एक विशेष वरदान प्राप्त था कि वे जीवन में जब भी पहली बार अपनी आंखों की पट्टी खोलकर जिसे भी देखेंगी, उसका शरीर वज्र के समान मजबूत और अभेद्य हो जाएगा।

इसी वरदान के कारण अधूरा रह गया दुर्योधन का कवच

महाभारत युद्ध के दौरान जब दुर्योधन रणभूमि में जा रहा था, तब गांधारी ने उसे अपने सामने पूरी तरह निर्वस्त्र आने का आदेश दिया ताकि उनकी दिव्य दृष्टि से दुर्योधन का पूरा शरीर वज्र का बन जाए और उसे कोई पराजित न कर सके।

हालांकि, माता के सामने जाने में लज्जावश दुर्योधन ने अपनी कमर पर पत्ते लपेट लिए। जब गांधारी ने पट्टी खोलकर उसे देखा, तो पत्तों से ढके हिस्से को छोड़कर दुर्योधन का बाकी शरीर तो वज्र का हो गया, लेकिन उसकी जांघें कमजोर रह गईं। यही कमजोरी बाद में युद्ध में उसकी मृत्यु का कारण बनी।