
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। देवत्व का सबसे बड़ा वैभव उसकी अलौकिक शक्ति में नहीं, बल्कि उसके मानवीय स्पर्श में है। यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ केवल आराध्य नहीं, परिवार के सबसे आत्मीय सदस्य बन जाते हैं।
स्नान पूर्णिमा पर शीतल जल से महाअभिषेक के बाद जब यह विश्वास जागता है कि प्रभु को ज्वर आ गया है, तब भक्ति अपने सबसे कोमल, सबसे लालित्यपूर्ण रूप में दिखाई देती है।
गढ़ाफाटक स्थित साहू धर्मशाला परिसर के भगवान जगदीश स्वामी (जगन्नाथ) मंदिर में इसी भावलोक के साथ भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के स्नान, पूजन एवं आरती के बाद मंदिर के कपाट पंद्रह दिनों के लिए बंद कर दिए गए। अब प्रभु रथयात्रा से एक दिन पूर्व, 15 जुलाई को भक्तों को पुनः दर्शन देंगे।
ट्रस्ट सदस्य श्रीकांत साहू बताते हैं कि इस अवधि को अनवसर कहा जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ की तपती ऋतु में शीतल स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। तब वे राजाधिराज नहीं, घर के उस प्रिय सदस्य की तरह हो जाते हैं, जिसकी सेवा में पूरा परिवार जुट जाता है। केवल दयितगण ही उनके एकांत कक्ष में प्रवेश करते हैं।
औषधीय जड़ी-बूटियों का काढ़ा, खिचड़ी, दलिया और फलों का रस उनके स्वास्थ्य लाभ का प्रसाद बनते हैं। यहाँ उपचार से अधिक मुखर होती है भारतीय संस्कृति की वह भावना, जो ईश्वर को सिंहासन पर नहीं, अपने स्नेह की गोद में बैठाकर देखती है।
जब यह ज्वरलीला पूर्ण होगी, तब 16 जुलाई को भगवान अपने रथ पर आरूढ़ होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे। साहू धर्मशाला से प्रारंभ होकर बड़ी खेरमाई, हनुमानताल तक पहुँचने वाली यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस विरह के बाद का मिलन है, जिसकी प्रतीक्षा भक्त पूरे पंद्रह दिनों तक करते हैं।
लोकविश्वास है कि यहां भगवान अपनी मौसी के घर विश्राम करते हैं। सच तो यह है कि जगन्नाथ की पूरी परंपरा हमें बताती है कि ईश्वर सबसे अधिक पूजनीय तब नहीं होते, जब वे सर्वशक्तिमान दिखाई देते हैं, वे सबसे अधिक प्रिय तब लगते हैं, जब वे हमारे अपने लगते हैं।