
धर्म डेस्क। माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए रखा जाने वाला अत्यंत कठिन जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत इस वर्ष 3 अक्टूबर 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा। जितिया व्रत में सुबह स्नान, ध्यान और निर्जला उपवास का संकल्प लिया जाता है, परंतु भगवान जीमूतवाहन की मुख्य पूजा और कथा का श्रवण शाम (प्रदोष काल) में करने की परंपरा है।
अक्सर पंचांग में तिथि दो दिनों में मिलने पर श्रद्धालुओं के बीच व्रत की सही तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आइए जानते हैं कि जितिया में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी का क्या नियम है और इस वर्ष पूजा व पारण का सही समय क्या रहेगा-
जितिया व्रत के निर्णय में केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि यह देखना अनिवार्य होता है कि प्रदोष काल (संध्या समय) में आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि किस दिन प्राप्त हो रही है-
सूर्यास्त के आसपास के संध्या काल को 'प्रदोष काल' कहा जाता है। जीवित्पुत्रिका व्रत की शास्त्रीय परंपरा में इसी समय राजा जीमूतवाहन, चील और सियारिन की पूजा कर व्रत-कथा सुनने का विधान है।
ध्यान रखें कि यहां 'प्रदोष' शब्द का अर्थ केवल संध्या/पूजा के समय से है; इसका संबंध त्रयोदशी तिथि को रखे जाने वाले 'प्रदोष व्रत' से नहीं है।
सुबह के समय स्नान, नित्य पूजा और व्रत का संकल्प लिया जाता है, लेकिन इसे शाम के मुख्य 'जितिया पूजन' के साथ एक नहीं मानना चाहिए।
शास्त्रों और प्रचलित विधान के अनुसार, शाम की पूजा या कथा सुनने के तुरंत बाद व्रत नहीं खोला जाता। जितिया का पूजन और पारण (व्रत खोलना) दो अलग-अलग क्रियाएं हैं। 3 अक्टूबर को पूरा दिन व पूरी रात निर्जला उपवास रखने के बाद अगले दिन (4 अक्टूबर) उदयातिथि और पंचांगीय नियम के अनुसार ही पारण किया जाएगा।
पूजा के दिन, संध्या पूजन और अगले दिन के पारण समय- इन तीनों को अलग-अलग समझना चाहिए।
पौराणिक कथा के अनुसार, नागमाता के पुत्र शंखचूड़ के प्राणों की रक्षा करने के लिए गरुड़ देव के सामने गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन स्वयं अपना देह समर्पित करने को तैयार हो गए थे। उनके इसी महान त्याग, वात्सल्य और रक्षा-भाव से जितिया व्रत का गहरा जुड़ाव है। मान्यता है कि विधि-विधान से यह व्रत करने पर संतान पर आने वाले बड़े से बड़े संकट दूर हो जाते हैं।
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