Karwa Chauth 2026: करवा चौथ पर पूजा की थाली में किन चीजों का क्या है महत्व
सुहागिनों के महापर्व करवा चौथ पर पूजा की थाली का अत्यंत विशिष्ट धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। थाली में सजी हर वस्तु दांपत्य जीवन के अलग-अलग पहलुओं और सौभाग्य को दर्शाती है। मिट्टी का करवा पंचतत्वों और वैवाहिक जीवन में प्रेम के प्रवाह का प्रतीक माना जाता है।
Publish Date: Tue, 27 Oct 2026 01:00:42 PM (IST)Updated Date: Tue, 27 Oct 2026 01:00:42 PM (IST)
करवा चौथ की पूजा थाली में हर सामग्री का विशेष आध्यात्मिक महत्वHighLights
- करवा चौथ की पूजा थाली में हर सामग्री का विशेष आध्यात्मिक महत्व
- नकारात्मकता दूर कर पवित्र दृष्टि का प्रतीक है छलनी; दीपक, अक्षत
- शाम को शिव परिवार की आराधना के बाद रात चंद्र दर्शन पर व्रत पारण
धर्म डेस्क। सुहागिन महिलाओं के सबसे बड़े और आस्था के महापर्व 'करवा चौथ' की तैयारियां देशभर में शुरू हो चुकी हैं। इस वर्ष करवा चौथ का पावन व्रत 29 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं।
करवा चौथ की पूजा में 'पूजा की थाली' का विशेष स्थान होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस थाली में रखी जाने वाली प्रत्येक वस्तु का अपना एक विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यदि थाली में जरूरी पूजन सामग्री न हो, तो पूजा अधूरी मानी जाती है।
पूजा की थाली में शामिल प्रमुख सामग्रियां और उनका महत्व
- मिट्टी का करवा: करवा इस व्रत का केंद्रीय प्रतीक है। यह पंचतत्वों (भूमि, जल, वायु, अग्नि और आकाश) का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें भरा जल शीतलता, पवित्रता और वैवाहिक जीवन में प्रेम के निरंतर प्रवाह का प्रतीक माना जाता है।
- छलनी (छन्नी): चंद्रमा और पति के दर्शन के लिए प्रयुक्त छलनी नकारात्मक ऊर्जा को छानकर दूर करने और केवल सकारात्मकता, प्रेम और पवित्र दृष्टि को जीवन में बनाए रखने का संकेत देती है।
- दीपक: थाली में प्रज्ज्वलित दीपक अंधकार, भ्रम और संकटों के नाश का प्रतीक है। यह दांपत्य जीवन में सदैव ज्ञान और प्रेम की ज्योति जलाए रखने की प्रार्थना का रूप है।
- अक्षत (चावल): बिना टूटे अखंड चावल (अक्षत) पूजा की पूर्णता और अटूट सौभाग्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह वैवाहिक रिश्ते के कभी न टूटने का प्रतीक हैं।
- कुमकुम, सिंदूर और चंदन: सिंदूर और कुमकुम सुहाग के सर्वोपरि प्रतीक हैं। यह जीवनसाथी के दीर्घायु होने और दांपत्य जीवन में सौभाग्य और मान-सम्मान की वृद्धि का आह्वान करते हैं।
- मीठा और फल: भोग के रूप में रखी गई मिठाई या फल रिश्तों में मिठास, मधुरता और समृद्धि बनाए रखने के उद्देश्य से अर्पित किए जाते हैं।
- जल का लोटा (अर्घ्य के लिए): चंद्र दर्शन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए लोटे में शुद्ध जल रखा जाता है। यह मानसिक शांति और जीवन में शीतलता प्रदान करता है।
विधि-विधान से करें पूजन
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, शाम के समय शुभ मुहूर्त में मां गौरी, भगवान शिव, कार्तिकेय और गणेश जी की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके बाद रात्रि में चंद्रोदय होने पर छलनी से पहले चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य दिया जाता है और फिर उसी छलनी से पति का मुख देखकर व्रत का पारण किया जाता है।