महावीर जयंती 2026: मानवता का संदेश देने वाले पावन पर्व की जानिए शुभ तिथि और महत्व
Mahavir Jayanti 2026: महावीर जयंती उनके त्याग और अहिंसा, सत्य के संदेश को याद करने का अवसर है। ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 28 Mar 2026 03:49:17 PM (IST)Updated Date: Sat, 28 Mar 2026 03:58:57 PM (IST)
जैन धर्म का प्रमुख पर्व है महावीर जयंती (AI Generated Image)HighLights
- कुंडग्राम में हुआ था भगवान महावीर का जन्म
- 12 वर्षों की तपस्या के बाद मिला कैवल्य ज्ञान
- दान-पुण्य और रथ यात्राओं का विशेष महत्व
धर्म डेस्क। जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर महावीर (Mahavira Jayanti) का जन्मोत्सव हर वर्ष महावीर जयंती के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सत्य, अहिंसा और मानवता का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 31 मार्च को मनाया जाएगा।
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भगवान महावीर का जीवन परिचय
भगवान महावीर का जन्म लगभग 2,500 वर्ष पहले कुंडग्राम (Kundagrama) में एक राजपरिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम वर्द्धमान था। उनके पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला थीं। सांसारिक जीवन से विरक्त होकर उन्होंने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया और आत्मज्ञान की खोज में निकल पड़े। लगातार 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें ‘कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति हुई, जिसके बाद उन्होंने लोगों को धर्म और सत्य का मार्ग दिखाया।
ऐसे मनाई जाती है महावीर जयंती
महावीर जयंती के अवसर पर जैन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है। श्रद्धालु भगवान महावीर की प्रतिमाओं का अभिषेक करते हैं और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। कई स्थानों पर भव्य रथ यात्राएं भी निकाली जाती हैं।
इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। लोग जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं और समाजसेवा के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
महावीर स्वामी के जीवन बदलने वाले विचार
- भगवान महावीर के उपदेश आज भी समाज को सही दिशा देते हैं। उनका “जियो और जीने दो” का संदेश हर जीव के प्रति करुणा और सम्मान सिखाता है।
- उन्होंने “अहिंसा परमो धर्म” का सिद्धांत दिया, जिसमें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक हिंसा से भी बचने की बात कही गई है।
- सत्य के मार्ग पर चलना और दूसरों की वस्तु बिना अनुमति ग्रहण न करना, उनके प्रमुख उपदेशों में शामिल है।
- इसके अलावा “अपरिग्रह” का सिद्धांत सिखाता है कि इच्छाओं और वस्तुओं का अधिक संग्रह ही दुखों का कारण है, इसलिए जरूरतों को सीमित रखना चाहिए।
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