
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: ज्येष्ठ अमावस्या पर 16 मई शनिवार को शहर सहित जिलेभर में वट सावित्री व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा करेंगी। शहर के मंदिरों और बरगद वाले स्थलों पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। पूजा सामग्री की दुकानों में भीड़ बढ़ने लगी है और बाजारों में व्रत को लेकर उत्साह का माहौल दिखाई दे रहा है।
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प्राचीन काल में मद्र देश की राजकुमारी सावित्री ने सर्वगुण संपन्न लेकिन अल्पायु राजपुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। देवर्षि नारद ने भविष्यवाणी की थी कि विवाह के ठीक एक वर्ष बाद ज्येष्ठ अमावस्या को सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी, फिर भी सावित्री अपने फैसले पर अटल रही।
विवाह के बाद वह राजवैभव छोड़ वन में सास-ससुर और पति की सेवा करने लगी। जब वह निश्चित दिन आया, तो सत्यवान जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक अचेत होकर गिर पड़ा। तभी वहां साक्षात मृत्यु के देवता यमराज आए और सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए।
सावित्री भी उनके पीछे-पीछे जाने लगी। यमराज ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन सावित्री की अद्भुत धर्मनिष्ठा, पातिव्रत्य शक्ति और ज्ञानभरी बातें देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए। यमराज ने उसे सत्यवान के प्राण छोड़कर तीन वरदान मांगने को कहा।
सावित्री ने चतुराई से पहले दो वरदानों में अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राज्य वापस मांगा। तीसरे वरदान में उसने सौ पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य मांग लिया। यमराज ने बिना सोचे-समझे 'तथास्तु' कह दिया।
तब सावित्री ने विनम्रता से कहा कि एक पतिव्रता नारी अपने पति के बिना संतान को जन्म कैसे दे सकती है? यमराज सावित्री की इस बुद्धिमत्ता के आगे निरुत्तर हो गए और उन्हें हार मानकर सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े। सावित्री तुरंत वट वृक्ष (बरगद) के पास लौटी, जहां सत्यवान जीवित होकर उठ बैठा।
संदेश: तभी से सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और पति की दीर्घायु के लिए ज्येष्ठ अमावस्या पर यह व्रत रखती हैं।