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यूपी के सोनभद्र में अवैध खनन और प्रदूषण से दम तोड़ती नदियों की अब होगी 'आरती', घाटों पर पुजारी होंगे तैनात, फरमान पर उठे सवाल

एक तरफ सोनांचल की नदियां औद्योगिक प्रदूषण और अवैध खनन के कारण अपना अस्तित्व खो रही हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन उन्हें बचाने के बजाय अब गंगा की तर्ज पर उ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: manoj dubey
Publish Date: Mon, 27 Jul 2026 01:34:51 PM (IST)Updated Date: Mon, 27 Jul 2026 01:34:51 PM (IST)
यूपी के सोनभद्र में अवैध खनन और प्रदूषण से दम तोड़ती नदियों की अब होगी 'आरती', घाटों पर पुजारी होंगे तैनात, फरमान पर उठे सवाल

HighLights

  1. धरातल पर नदियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है
  2. जिला गंगा समिति के सदस्य संयोजक ने पत्र जारी किया
  3. हर घाट पर पुजारी होंगे तैनात, प्रशिक्षण भी मिलेगा

डिजिटल डेस्क, सोनभद्र। एक तरफ सोनांचल की नदियां औद्योगिक प्रदूषण और अवैध खनन के कारण अपना अस्तित्व खो रही हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन उन्हें बचाने के बजाय अब गंगा की तर्ज पर उनकी 'आरती' उतारने की तैयारी कर रहा है। धरातल पर नदियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है।

हाल ही में सोन नदी में अवैध खनन के कारण बने गहरे गड्ढों में डूबकर दो मासूम बच्चों की मौत इसका जीता-जागता प्रमाण है। बावजूद इसके, खनन माफियाओं और उद्योगों के कचरे पर लगाम कसने के बजाय, प्रशासन का ध्यान अब घाटों पर पुजारी बैठाने पर है।


प्रशासन की चुप्पी और नया फरमान

क्षेत्र में अवैध खनन बदस्तूर जारी है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। इस बीच, राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के निर्देश पर जिला गंगा समिति के सदस्य संयोजक (प्रभागीय वनाधिकारी) ने एक नया पत्र जारी किया है। इसके तहत सोन, रिहंद, कनहर, कर्मनाशा और बेलन जैसी प्रमुख नदियों के घाटों पर नियमित आरती की शुरुआत की जाएगी। इसके लिए हर घाट पर एक पुजारी तैनात किया जाएगा, जिन्हें विशेष प्रशिक्षण भी मिलेगा।

क्या एक पुजारी रोक पाएगा माफियाओं को?

योजना के अनुसार, पुजारियों का चयन उन लोगों में से होगा जो नदी संरक्षण और 'नमामि गंगे' में सक्रिय हैं। सरकार का तर्क है कि इससे नदियों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अवैध खनन और प्रदूषण को पूरा प्रशासनिक अमला नहीं रोक पा रहा है, उसे घाट पर बैठा एक पुजारी कैसे रोकेगा?

सरकारी पत्र में सामने आईं हास्यास्पद खामियां

अधिकारियों ने यह फरमान जारी करने से पहले न तो जमीनी हकीकत परखी और न ही धार्मिक मान्यताओं का ध्यान रखा। जारी पत्र में कई बड़ी खामियां हैं:

सोन नदी नहीं, 'नद' है: पत्र में सोन नदी की आरती की बात कही गई है, जबकि पौराणिक मान्यताओं में 'सोन' को पुरुष (नद) माना गया है, और इसे अभिशापित भी कहा गया है। ऐसे में इसकी आरती की मान्यता ही नहीं है।

छठ पूजा में पुजारी का जिक्र: पत्र में लिखा गया है कि ओबरा में छठ पूजा स्थानीय पुजारियों द्वारा कराई जाती है। जबकि सच यह है कि 'छठ' विशुद्ध रूप से लोक-आस्था का पर्व है, जिसमें किसी भी पुजारी या बिचौलिए की कोई भूमिका नहीं होती।

बजट का कोई जिक्र नहीं: आरती के लिए पुजारियों की नियुक्ति और घाटों की व्यवस्था के लिए बजट कहां से आएगा, इसका पत्र में कोई उल्लेख नहीं है।

बनारस से आए पुजारियों द्वारा ही आरती की जाती है

वर्तमान में ओबरा की रेणुका नदी के घाट पर छठ या देव दीपावली जैसे पर्वों पर बनारस से आए पुजारियों द्वारा ही आरती की जाती है, नियमित तौर पर नहीं। ऐसे में बिना ठोस रणनीति और बजट के नदियों की आरती का यह नया फरमान सिर्फ कागजी खानापूर्ति और जनभावनाओं से खेलने का प्रयास अधिक नजर आ रहा है।

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