
डिजिटल डेस्क, मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के लालबाग स्थित सिद्धपीठ श्री काली मंदिर में इन दिनों सिर्फ पूजा-अर्चना ही नहीं, बल्कि इतिहास की एक अनोखी परत भी लोगों को अपनी ओर खींच रही है। मंदिर की संपत्ति से जुड़े करीब 150 साल पुराने ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिन्होंने न सिर्फ मंदिर की पुरानी पहचान उजागर की है, बल्कि शहर के लोगों को अपने अतीत से जोड़ दिया है।
तहसील और रजिस्ट्री विभाग के अभिलेखों में वर्ष 1875 के जो दस्तावेज मिले हैं, वे उर्दू और फारसी मिश्रित भाषा में लिखे गए हैं। इन दस्तावेजों में मंदिर का नाम ‘श्री काली कोठरी’ दर्ज है। पुराने कागजों पर धुंधली स्याही, फारसी लिपि और समय की मार झेल चुके पन्ने अब मंदिर के इतिहास को फिर से जीवंत कर रहे हैं।

(श्री काली मंदिर)
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा अब इन दस्तावेजों का हिंदी में अनुवाद करा रहा है। संतों और मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों का कहना है कि इन कागजों के सामने आने से मंदिर की वास्तविक भूमि और उसकी पुरानी सीमाओं का पता चल सकेगा। अनुवाद पूरा होने के बाद जमीन का सीमांकन कराया जाएगा, ताकि भविष्य में कोई अवैध कब्जे की कोशिश न कर सके।
मंदिर से जुड़े बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां करीब छह बीघा भूमि दर्ज थी, लेकिन समय के साथ उसका बड़ा हिस्सा सिकुड़ता चला गया। लंबे समय तक जूना अखाड़ा के पास स्पष्ट अभिलेख नहीं थे। ऐसे में नौ अप्रैल को अखाड़े के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी अनुज सिंह से मुलाकात कर पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग की थी। प्रशासन के निर्देश पर तहसील और रजिस्ट्री विभाग ने पुराने दस्तावेज खोज निकाले।
दिलचस्प बात यह है कि श्री काली मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि लोककथाओं और चमत्कारों से जुड़ी पहचान भी रखता है। करीब 400 साल पुराने इस मंदिर को ‘मिश्री गिरी के टीले’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि अंग्रेज शासन के दौरान जब अधिकारियों ने मंदिर की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की, तब यहां सेवा कर रहे संत मिश्री गिरी ने मिट्टी उठाकर फेंकी और कहा कि जहां तक मिट्टी जाएगी, वहीं तक मठ की सीमा होगी। लोगों का विश्वास है कि वह मिट्टी दूर जाकर मिश्री में बदल गई थी। इसके बाद अंग्रेजों ने कब्जे का इरादा छोड़ दिया।
आज भी इस मंदिर में रोज हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र मेले में दिल्ली, गाजियाबाद, हापुड़ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों से भक्त यहां आते हैं। पुराने दस्तावेज मिलने के बाद मंदिर परिसर में इतिहास, आस्था और विरासत को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
मंदिर प्रबंधन का मानना है कि ये दस्तावेज सिर्फ जमीन का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि मुरादाबाद की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का हिस्सा हैं। अब लोगों को उम्मीद है कि इन कागजों के जरिए मंदिर का पुराना स्वरूप और इतिहास दोनों फिर से सामने आएंगे।