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माता-पिता का त्याग: सीमित आय, असीमित हौसले, खेतों की पगडंडियों से MBBS तक संकल्प और संघर्ष की एक प्रेरक कहानी

यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है उन माता-पिता के विश्वास की और एक बेटे की अटूट निष्ठा की, जो हर किसी के लिए एक बहुत बड...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: manoj dubey
Publish Date: Fri, 17 Jul 2026 12:55:17 PM (IST)Updated Date: Fri, 17 Jul 2026 12:56:39 PM (IST)
माता-पिता का त्याग: सीमित आय, असीमित हौसले, खेतों की पगडंडियों से MBBS तक संकल्प और संघर्ष की एक प्रेरक कहानी
किसान के बेटे रविंद्र ने नीट-यूजी (NEET-UG) री-एग्जाम में 1955वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल की है।

HighLights

  1. किसान के बेटे ने नीट-यूजी री एग्जाम में 1955वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल की
  2. पिता ने अपनी जरूरतें कम की, लेकिन बेटे की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी
  3. सपना KGMU या BHU जैसे देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों से एमबीबीएस करना

डिजिटल डेस्क, कानपुर। बस्ती जिले का एक छोटा सा गांव। वहां रहने वाले एक साधारण किसान, जगदीश की आंखों में एक बहुत असाधारण सपना पल रहा था। सपना था, मेरा बेटा एक दिन बड़ा डॉक्टर बनेगा। यह सिर्फ एक पिता का सपना नहीं था, बल्कि एक ऐसा संकल्प था जिसे उनके बेटे रविंद्र ने अपनी अटूट मेहनत और लगन से सच कर दिखाया है।

यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है उन माता-पिता के विश्वास की और एक बेटे की अटूट निष्ठा की, जो हर किसी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

पिता ने अपनी जरूरतें कम की, बेटे की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी

किसान जगदीश की खेती से होने वाली आय बहुत सीमित थी। लेकिन जब बात बेटे के भविष्य की आई, तो उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को कभी आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया। बेटे को बेहतर शिक्षा के लिए गांव से कानपुर भेजना। उन्होंने खुद कितनी भी मुश्किलें सही हों, अपनी जरूरतों को कम किया हो, लेकिन रविंद्र की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी।


माता-पिता के लिए सीख

यह कहानी सिखाती है कि संसाधन भले ही सीमित हों, लेकिन अगर आप अपने बच्चे की क्षमता पर विश्वास करते हैं और उसका साथ देते हैं, तो वे आसमान छू सकते हैं। आपका त्याग ही उनके हौसलों की सबसे मजबूत नींव बनता है।

बेटे की लगन, लक्ष्य के प्रति अटूट ईमानदारी

कानपुर पहुंचकर रविंद्र ने भी पिता के पसीने की हर एक बूंद का मान रखा। शहर की चकाचौंध से दूर, उसने सिर्फ अपनी किताबों और अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया। उसने नियमित अध्ययन (Regular Study) को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।

न्यूरो सर्जन या हार्ट सर्जन बनना सपना

रविंद्र की इसी मेहनत का परिणाम है कि उन्होंने नीट-यूजी (NEET-UG) री-एग्जाम में 1955वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल कर पूरे देश में अपना परचम लहराया है। अब उनका सपना केजीएमयू (KGMU), लखनऊ या बीएचयू (BHU) जैसे देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों से एमबीबीएस करना है। वह भविष्य में न्यूरो सर्जन या हार्ट सर्जन बनकर समाज और देश की सेवा करना चाहते हैं।

बच्चों के लिए सीख

परिस्थितियां चाहे जो भी हों, अगर आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं और नियमित रूप से मेहनत करते हैं, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं है।

सफलता का मूल मंत्र

रविंद्र ने अपनी इस शानदार सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के महान त्याग और शिक्षकों के सही मार्गदर्शन को दिया है। देश के लाखों बच्चों को प्रेरित करते हुए उन्होंने जो कहा, वह हर विद्यार्थी को अपने जीवन में उतार लेना चाहिए।

यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत पूरी ईमानदारी से की जाए, तो आपकी ग्रामीण पृष्ठभूमि या सीमित संसाधन कभी भी आपकी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते।

रविंद्र की यह कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि सपने अमीरी-गरीबी नहीं देखते, वे सिर्फ सच्ची मेहनत और पक्के इरादों के मोहताज होते हैं।

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