
डिजिटल डेस्क। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के दो 'रिंकू सिंह' इन दिनों देशभर में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। जहां एक ओर क्रिकेटर रिंकू सिंह मैदान पर मैच फिनिशर के रूप में धूम मचा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी रिंकू सिंह राही ने व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपने इस्तीफे से प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राही का यह कदम उनकी खुद्दारी और ईमानदारी की एक नई मिसाल पेश कर रहा है।
वर्ष 2022-23 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने पद से त्यागपत्र देने का मुख्य कारण 'काम की कमी' बताया है। राही का कहना है कि उन्हें अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं दी जा रही थी और वे बिना किसी ठोस सेवा के सरकारी खजाने से वेतन लेना अनैतिक समझते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर एक अलग ही सिस्टम कार्य कर रहा है, जिसके कारण वे अपनी भूमिका का निर्वहन सही ढंग से नहीं कर पा रहे थे।
रिंकू सिंह राही की चर्चा पिछले वर्ष जुलाई में तब तेज हुई थी, जब शाहजहांपुर के एसडीएम पद पर तैनाती के दौरान उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में वे वकीलों के सामने उठक-बैठक करते नजर आए थे। इस घटना के बाद उन्हें पद से हटाकर राजस्व विभाग में अटैच कर दिया गया था।
काफी समय बीतने के बाद भी फील्ड पोस्टिंग न मिलने और कोई जिम्मेदारी न सौंपे जाने से नाराज होकर उन्होंने अंततः इस्तीफा देने का साहसिक फैसला लिया।
देश की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी माने जाने वाली आईएएस सेवा को ठुकराकर रिंकू राही अब अपने पुराने पीसीएस (PCS) कैडर में लौटना चाहते हैं। उन्होंने सिस्टम पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि महीनों से वे बिना काम के वेतन ले रहे हैं, जो उन्हें कतई ठीक नहीं लगता।
उन्होंने अपनी नैतिकता के आधार पर कुछ समय तक वेतन लेने से भी इनकार कर दिया और सरकार से अनुरोध किया है कि यदि उन्हें काम नहीं देना है, तो उन्हें वापस उनकी पुरानी सेवा में भेज दिया जाए।
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रिंकू सिंह राही की कहानी प्रेरणा और संघर्ष की एक अनूठी गाथा है। अलीगढ़ के नौरंगाबाद क्षेत्र के निवासी रिंकू के पिता सौदान सिंह एक आटा-चक्की चलाते थे, जिससे पूरे परिवार का भरण-पोषण होता था। एक साधारण परिवेश से निकलकर आईएएस जैसे बड़े पद पर पहुँचने वाले रिंकू ने कभी अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उनके परिवार को उनकी ईमानदारी पर गर्व है।
ईमानदारी के प्रति रिंकू राही का जज्बा पुराना है। वर्ष 2009 में जब वे मुजफ्फरनगर में समाज कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात थे, तब उन्होंने 100 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले का पर्दाफाश किया था।
इस कारण उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उन्हें गंभीर चोटें आईं और उनकी एक आँख की रोशनी भी प्रभावित हुई। बावजूद इसके, उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना झुकना स्वीकार नहीं किया।
रिंकू राही के इस्तीफे के बाद अब उनके परिवार और समर्थकों को सरकार के उचित निर्णय का इंतजार है। उनके पिता सौदान सिंह का कहना है कि ईमानदारों का बैंक बैलेंस भले न हो, लेकिन उनका ईमान ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।
वहीं, उनके ताऊ रघुवीर सिंह का मानना है कि यदि रिंकू को अन्य अधिकारियों की तरह सम्मानजनक पद और जिम्मेदारी दी जाती, तो आज यह नौबत नहीं आती। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन उनके इस इस्तीफे और पीसीएस कैडर में वापसी के अनुरोध पर क्या रुख अपनाता है।