राम मंदिर चढ़ावा चोरी का जिक्र कर इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, 'भ्रष्टाचारियों के लिए मृत्युदंड पर होना चाहिए विचार'
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि समाज में ईमानदारी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
Publish Date: Wed, 22 Jul 2026 01:15:14 PM (IST)Updated Date: Wed, 22 Jul 2026 01:17:59 PM (IST)
HighLights
- भ्रष्टाचार को सामान्य व्यवहार की तरह स्वीकार कर लिया गया है
- समाज में अपेक्षित संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती
- अवैध निर्माण में अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि समाज में ईमानदारी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। अदालत ने राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि इस तरह की घटना भी लोगों को शर्मिंदा नहीं करती, तो यह नैतिक मूल्यों के गंभीर पतन का संकेत है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए मृत्युदंड जैसे कठोर दंड पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
मामला अब तीसरे न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाएगा
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने हमीरपुर निवासी फैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई के दौरान अपने 51 पृष्ठों के फैसले में की। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन के साथ गठित खंडपीठ ने की थी। हालांकि, कुछ महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद होने के कारण मामला अब तीसरे न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाएगा।
'भ्रष्टाचार अब सामान्य मान लिया गया'
अपने फैसले में न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि दशकों से देश में भ्रष्टाचार को सामान्य व्यवहार की तरह स्वीकार कर लिया गया है। उन्होंने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में 182 देशों में 91वें स्थान पर है, लेकिन इसके बावजूद समाज में अपेक्षित संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं के दान से जुड़ी कथित चोरी का विवाद इस नैतिक गिरावट का बड़ा उदाहरण है।
अवैध निर्माण में अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नगर निगम और अन्य विकास प्राधिकरणों के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध निर्माण होते हैं। रिश्वत लेकर नियमों की अनदेखी की जाती है, जबकि बाद में कार्रवाई का खामियाजा आम नागरिकों और मकान खरीदने वालों को भुगतना पड़ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर दिए अहम निर्देश
मामले में याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि उनके रिश्तेदार पर दर्ज आपराधिक मामलों के आधार पर उनकी संपत्तियों पर भी बुलडोजर कार्रवाई की जा सकती है, जबकि उनका उन संपत्तियों पर स्वामित्व नहीं है। राज्य सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ तथ्य छिपाए हैं।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अपने फैसले में कहा कि किसी आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक उसके मकान को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति में तीन वर्ष या उससे अधिक समय से रह रहा है, तो ध्वस्तीकरण से कम से कम एक वर्ष पहले उसे नोटिस देकर वैकल्पिक व्यवस्था का अवसर दिया जाना चाहिए।
इन निर्देशों पर खंडपीठ में मतभेद
हालांकि, न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन ने इन निर्देशों से असहमति जताई। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट दो वर्ष जैसी निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि ऐसी व्यवस्था का दुरुपयोग कर लोग कार्रवाई से बचने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज करा सकते हैं।
ध्वस्तीकरण से एक वर्ष पहले नोटिस देने की शर्त से भी उन्होंने असहमति व्यक्त की। इसी कारण अब इस मामले का अंतिम निर्णय तीसरे न्यायाधीश करेंगे।