UP में बिजली हो सकती है महंगी, 20% तक बढ़ सकते हैं दाम, विनियामक आयोग ने स्वीकार किया ARR प्रस्ताव
UP Electricity: उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने बिजली कंपनियों द्वारा दाखिल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 07 Feb 2026 04:36:33 PM (IST)Updated Date: Sat, 07 Feb 2026 04:36:33 PM (IST)
UP में बिजली हो सकती है महंगी।HighLights
- बिजली उपभोक्ताओं को लग सकता है झटका
- कंपनियों ने दिखाया ₹12,453 करोड़ का घाटा
- स्मार्ट मीटर का खर्च भी एआरआर में शामिल
डिजिटल डेस्क। उत्तर प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला नया वित्तीय वर्ष (2026-27) जेब पर भारी पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने बिजली कंपनियों द्वारा दाखिल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। कंपनियों द्वारा दिखाए गए 12,453 करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई के लिए अप्रैल से बिजली दरों में औसतन 20 प्रतिशत तक की वृद्धि होने की संभावना जताई जा रही है।
क्यों महंगी हो सकती है बिजली?
आयोग द्वारा स्वीकार किए गए प्रस्तावों के अनुसार, बिजली कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारी-भरकम खर्चों का ब्यौरा पेश किया है:
- कुल राजस्व आवश्यकता (ARR): 1,18,741 करोड़ रुपये।
- बिजली खरीद खर्च: लगभग 85,305 करोड़ रुपये।
- स्मार्ट मीटर संचालन: 3,837 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान।
- दिखाया गया घाटा: सरकार से 17,100 करोड़ की सब्सिडी मिलने के बाद भी 12,453 करोड़ रुपये का 'राजस्व गैप' दिखाया गया है।
राजनीतिक दांवपेंच और आयोग की भूमिका
दिलचस्प बात यह है कि बिजली कंपनियों ने एआरआर तो दाखिल कर दिया, लेकिन दरों में बढ़ोतरी का स्पष्ट प्रस्ताव (टैरिफ) अभी तक नहीं सौंपा है। माना जा रहा है कि आगामी पंचायत और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कंपनियों ने गेंद आयोग के पाले में डाल दी है, ताकि सीधे तौर पर दरें बढ़ाने की बदनामी से बचा जा सके।
नियमों के मुताबिक, एआरआर स्वीकार होने के बाद आयोग को 120 दिनों के भीतर नई दरों का निर्धारण करना अनिवार्य है।
जनता से मांगे गए सुझाव
नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों को सख्त निर्देश दिए हैं:
- कंपनियों को 3 दिन के भीतर समाचार पत्रों में एआरआर के आंकड़े प्रकाशित करने होंगे।
- आंकड़ों के प्रकाशन के बाद उपभोक्ताओं के पास 21 दिनों का समय होगा, जिसमें वे अपनी आपत्तियां और सुझाव आयोग को भेज सकेंगे।
- मार्च महीने में आयोग प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर उपभोक्ताओं की समस्याएं सुनेगा और दर निर्धारण की अंतिम प्रक्रिया पूरी करेगा।
यह भी पढ़ें- लखनऊ में मायावती की अहम बैठक, 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी की तैयारियों की करेंगी समीक्षा
उपभोक्ता परिषद का कड़ा विरोध
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने कंपनियों के दावों को पूरी तरह नकार दिया है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा का तर्क है कि:
- कंपनियों पर उपभोक्ताओं का 51,000 करोड़ रुपये से अधिक का सरप्लस बकाया है।
- नियमतः अगले पांच वर्षों तक बिजली दरों में 8% की वार्षिक कटौती होनी चाहिए।
- केंद्र सरकार और ऊर्जा मंत्री के वादे के खिलाफ कंपनियां स्मार्ट मीटर का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल रही हैं।
पिछले छह वर्षों से उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें स्थिर बनी हुई हैं। अब देखना यह होगा कि नियामक आयोग कंपनियों के घाटे को प्राथमिकता देता है या उपभोक्ता परिषद के सरप्लस के तर्क को मानकर राहत प्रदान करता है।