डिजिटल डेस्क,अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले पूर्णकालिक मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) के चयन की प्रशासनिक प्रक्रिया अब अंतिम दौर में पहुंच गई है। बुधवार को होने वाली ट्रस्ट की अहम बैठक में सीईओ पद के लिए तैयार किए गए तीन नामों के पैनल पर अंतिम मंथन होगा। इसके बाद राम मंदिर के पहले पूर्णकालिक सीईओ के नाम की औपचारिक घोषणा की जा सकती है।
ट्रस्ट की बड़ी बैठक बुधवार शाम चार बजे मणिरामदास छावनी में प्रस्तावित है। सीईओ पद की दौड़ में पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय, पूर्व आईएएस अधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा और बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी डॉ. परेश सक्सेना के नाम सबसे आगे बताए जा रहे हैं। खास बात यह है कि तीनों अधिकारी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं।
5,585 आवेदनों की जांच के बाद तैयार हुआ पैनल
सीईओ के चयन के लिए गठित तीन सदस्यीय सर्च कमेटी ने देशभर से प्राप्त 5,585 आवेदनों की गहन स्क्रूटनी की। सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल वीके चतुर्वेदी और पूर्व परमाणु वैज्ञानिक डॉ. सुरेश हावड़े वाली समिति ने प्रक्रिया पूरी करने के बाद तीन शीर्ष योग्य अभ्यर्थियों का अंतिम पैनल तैयार किया।
यह पैनल मंगलवार को ट्रस्ट को सौंप दिया गया। अब बुधवार को होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में इन्हीं तीन नामों पर अंतिम चर्चा होगी।
राजेश पांडेय का नाम सबसे आगे
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पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय को सीईओ पद की दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश पुलिस में उन्हें तेज-तर्रार और ईमानदार छवि वाले अधिकारियों में गिना जाता है। पुलिस और प्रशासनिक नेतृत्व का उन्हें लंबा अनुभव रहा है। राजेश पांडेय अपने करियर में 80 से अधिक एनकाउंटर में शामिल रहे हैं।
उन्होंने लखनऊ, अलीगढ़, मेरठ और सहारनपुर जैसे बड़े और संवेदनशील जिलों में एसएसपी के तौर पर जिम्मेदारी संभाली है। वे उत्तर प्रदेश एसटीएफ (STF) और एटीएस (ATS) के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल रहे हैं। राज्य की पुलिस व्यवस्था में मोबाइल फोन ट्रैकिंग प्रणाली की शुरुआत का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
1990 के दशक में उत्तर प्रदेश के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला को ढेर करने वाली विशेष टीम में भी राजेश पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इसके अलावा 2005 के अयोध्या आतंकी हमले, 2006 के वाराणसी दशाश्वमेध घाट धमाके और लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच का उन्होंने नेतृत्व किया।
योगेश्वर राम मिश्रा के पास अयोध्या प्रशासन का अनुभव
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सीईओ पद के लिए दूसरा प्रमुख नाम रिटायर्ड आईएएस अधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा का है। 1985 के PPS और 2005 बैच के आईएएस अधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा की पहली तैनाती बतौर जिलाधिकारी बाराबंकी में हुई थी। वे अयोध्या के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
उनके कार्यकाल के दौरान राम मंदिर प्रोजेक्ट और अयोध्या का कायाकल्प सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल था। ऐसे में उन्हें अयोध्या के प्रशासन और यहां की व्यवस्थाओं की प्रत्यक्ष जानकारी हासिल है।
उनका प्रशासनिक अनुभव केवल जिला प्रशासन तक सीमित नहीं रहा है। वे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और धार्मिक-पर्यटन परियोजनाओं से भी जुड़े रहे हैं। इनमें काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से जुड़ी जिम्मेदारियां भी शामिल हैं। वर्तमान में योगेश्वर राम मिश्रा उत्तर प्रदेश स्टेट पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल में मेंबर एडमिन हैं।
तीसरे दावेदार डॉ. परेश सक्सेना
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पैनल में तीसरा नाम बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी डॉ. परेश सक्सेना का बताया जा रहा है। उन्होंने बिहार में जिम्मेदारियां संभालने के साथ ही केंद्र में प्रतिनियुक्ति के दौरान भी महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। उनकी चिकित्सा शिक्षा की पृष्ठभूमि भी उन्हें अन्य दावेदारों से अलग अनुभव प्रदान करती है। प्रशासनिक और पुलिस सेवा के साथ चिकित्सा शिक्षा का अनुभव उनके प्रोफाइल की एक खास विशेषता माना जा रहा है।
सुरक्षा समन्वय समिति पर भी होगा विचार
दो सितंबर को प्रस्तावित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक केवल सीईओ चयन के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है। बैठक के एजेंडे में राम मंदिर की सुरक्षा से जुड़ा एक अहम प्रस्ताव भी शामिल है। इसके तहत महासचिव की अध्यक्षता में स्थानीय सुरक्षा समन्वय समिति गठित करने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। इसका उद्देश्य मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय प्रशासन के बीच सुरक्षा से जुड़े मामलों में प्रभावी समन्वय स्थापित करना है।
अब सभी की निगाहेंट्रस्ट की बैठक पर टिकी हैं
प्रस्तावित समिति में ट्रस्ट के पदाधिकारियों के साथ पुलिस-प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को भी प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना है। अब सभी की निगाहें बुधवार शाम होने वाली ट्रस्ट की बैठक पर टिकी हैं, जहां सीईओ पद के लिए तीन नामों में से किसे अंतिम मंजूरी मिलती है, इस पर फैसला हो सकता है।