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पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कानूनी रूप से शून्य, ऐसे व्यक्ति को 'पति' नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुस्लिम समुदाय को छोड़कर अन्य किसी धर्म के व्यक्ति द्वारा पहली पत्नी के जीवित रहते और पहला विव...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: manoj dubey
Publish Date: Fri, 24 Jul 2026 03:38:22 PM (IST)Updated Date: Fri, 24 Jul 2026 03:40:23 PM (IST)
पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कानूनी रूप से शून्य, ऐसे व्यक्ति को 'पति' नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाई कोर्ट

HighLights

  1. विवाह के समय आरोपी की पहली पत्नी जीवित थी
  2. सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का विश्लेषण किया
  3. संदेह की स्थिति में लाभ आरोपी को मिलना चाहिए

डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुस्लिम समुदाय को छोड़कर अन्य किसी धर्म के व्यक्ति द्वारा पहली पत्नी के जीवित रहते और पहला विवाह वैध होने की स्थिति में किया गया दूसरा विवाह शुरू से ही शून्य (Void) माना जाएगा।

ऐसी स्थिति में दूसरी पत्नी के संदर्भ में संबंधित व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80 (दहेज मृत्यु) और धारा 85 (क्रूरता) के तहत 'पति' की कानूनी परिभाषा में नहीं आएगा।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने पीलीभीत निवासी सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए की। आरोपी के खिलाफ मधौटांडा थाने में बीएनएस की धारा 80(2), 85 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज है।


विवाह के समय आरोपी की पहली पत्नी जीवित थी

अभियोजन के अनुसार, मृतका आरोपी की दूसरी पत्नी थी और उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में शादी के सात वर्ष के भीतर मौत हो गई थी। बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि विवाह के समय आरोपी की पहली पत्नी जीवित थी और उसके साथ रह रही थी। इसलिए दूसरा विवाह कानून की दृष्टि में शून्य है और आरोपी को दूसरी पत्नी के संदर्भ में 'पति' नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का विश्लेषण किया

इस कानूनी प्रश्न पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का विश्लेषण किया। अदालत ने रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम (2004) मामले का उल्लेख किया, जिसमें दहेज कानूनों की व्यापक व्याख्या करते हुए महिलाओं के संरक्षण पर जोर दिया गया था।

वहीं, बाद के शिवचरण लाल वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2007) और पी. शिवकुमार बनाम राज्य (2023) के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि विवाह स्वयं कानूनन शून्य है, तो ऐसे मामले में बीएनएस की धारा 85 (पूर्व की धारा 498ए आईपीसी) के तहत आरोपी को 'पति' नहीं माना जा सकता।

संदेह की स्थिति में लाभ आरोपी को मिलना चाहिए

अदालत ने यह भी दोहराया कि दंडात्मक कानूनों की व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए और संदेह की स्थिति में लाभ आरोपी को मिलना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पहली शादी की वैधता ही विवादित या संदिग्ध हो, तो परिस्थितियों के आधार पर दूसरी शादी में रह रहे व्यक्ति को 'पति' माना जा सकता है।

पहली शादी कायम रहते हुए किया गया दूसरा विवाह शून्य

अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम तथा विदेशी विवाह अधिनियम के तहत पहली शादी कायम रहते हुए किया गया दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा। मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि मृतका ने जहर खाकर आत्महत्या की थी।

आरोपी के खिलाफ कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष आरोप नहीं था, उसका कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है। चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और वह 28 जनवरी 2026 से न्यायिक हिरासत में है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका मंजूर कर ली।

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