इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पहली शादी के रहते बिना ठोस सबूत दूसरी पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
Publish Date: Mon, 27 Jul 2026 01:57:04 PM (IST)Updated Date: Mon, 27 Jul 2026 01:57:04 PM (IST)
HighLights
- दूसरी शादी या लिव-इन रिलेशनशिप के पर्याप्त सबूत नहीं, तो हकदार नहीं
- कोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया
- हाई कोर्ट ने कौशांबी पारिवारिक न्यायालय के फैसले को सही माना
डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति की पहली शादी पहले से अस्तित्व में है और दूसरी शादी या लिव-इन रिलेशनशिप के पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तो महिला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी।
न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ल की पीठ ने कौशांबी पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली मंजू सोनकर की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
क्या है पूरा मामला?
कौशांबी जिले की मंजू सोनकर ने ओम प्रकाश के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारे भत्ते की मांग की थी। 15 जुलाई 2022 को कौशांबी फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज ने अपने फैसले में उनके जैविक नाबालिग बच्चे के लिए तो भरण-पोषण का दावा स्वीकार कर लिया था, लेकिन मंजू सोनकर की मांग खारिज कर दी थी।
फैमिली कोर्ट ने कहा था कि मंजू, ओम प्रकाश की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं हैं, क्योंकि हिंदू कानून के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी को वैध नहीं माना जाता।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ मंजू सोनकर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। उनके वकील ने तर्क दिया कि महिला को ओम प्रकाश की पहली शादी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अपने दावे को मजबूत करने के लिए उन्होंने ओडिशा हाईकोर्ट (अनुपमा प्रधान बनाम सुल्तान प्रधान) और सुप्रीम कोर्ट (चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा) के पूर्व फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की दलीलें?
साक्ष्यों और पुराने फैसलों की बारीकी से जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को अमान्य करार दिया। कोर्ट ने कहा, ओडिशा हाईकोर्ट का मामला अलग है। अनुपमा प्रधान मामले से जुड़े पक्षकार अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से आते थे, जिन पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता है। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा नहीं है।
चनमुनिया मामले में विवाह होने के तथ्य पर कोई विवाद नहीं था। इसके विपरीत, इस मामले में विपक्षी (ओम प्रकाश) ने याचिकाकर्ता के साथ किसी भी तरह के रिश्ते या शादी होने से पूरी तरह इनकार किया है। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने कौशांबी पारिवारिक न्यायालय के फैसले को सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी।