मृत व्यक्ति को आयकर नोटिस भेजना कानूनन अमान्य, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संसद से कानून में संशोधन पर विचार करने को कहा
अदालत ने कहा कि यह अधिकार क्षेत्र से जुड़ी ऐसी मूलभूत त्रुटि है, जिसे बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाकर या तकनीकी भूल बताकर वैध नहीं बनाया ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 24 Jul 2026 03:54:07 PM (IST)Updated Date: Fri, 24 Jul 2026 03:54:07 PM (IST)
HighLights
- संसद से कानून में आवश्यक संशोधन पर विचार करने का आग्रह
- मृत्यु के बाद आयकर रिटर्न दाखिल करना कानून के अनुरूप नहीं था
- धारा 148 के तहत जारी वैध नोटिस ही पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया का आधार
डिजिटल डेस्क, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मृत व्यक्ति के नाम आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) का नोटिस जारी करना कानून की दृष्टि में पूरी तरह अमान्य है।
अदालत ने कहा कि यह अधिकार क्षेत्र से जुड़ी ऐसी मूलभूत त्रुटि है, जिसे बाद में कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाकर या तकनीकी भूल बताकर वैध नहीं बनाया जा सकता।
कानून में आवश्यक संशोधन पर विचार करने का आग्रह
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने आशा दुबे की याचिका स्वीकार करते हुए मृतक के नाम जारी नोटिस, उसके आधार पर पारित पुनर्मूल्यांकन आदेश और कर मांग को निरस्त कर दिया। साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश देते हुए संसद से इस संबंध में कानून में आवश्यक संशोधन पर विचार करने का आग्रह किया।
कानून की कमी दूर करना संसद का अधिकार
हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले ने आयकर कानून में मौजूद एक ऐसी कमी (लैकूना) को उजागर किया है, जिससे भविष्य में विभाग को राजस्व हानि उठानी पड़ सकती है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका कानून में नए शब्द जोड़कर या उसका दायरा बढ़ाकर इस कमी को दूर नहीं कर सकती। ऐसा करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता आशा दुबे ने अदालत को बताया कि उनके पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो गया था। इसके बावजूद आयकर विभाग ने मार्च 2025 में उनके नाम से आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन का नोटिस जारी कर दिया। विभाग का कहना था कि ओमैक्स समूह पर हुई तलाशी के दौरान 27.44 लाख रुपये के कथित नकद लेन-देन की जानकारी मिली थी।
आरोप था कि संजय दुबे ने फ्लैट खरीदने के लिए इस राशि का भुगतान किया था। बाद में विभाग ने आशा दुबे को कानूनी उत्तराधिकारी मानते हुए लगभग 39.67 लाख रुपये की कर देयता निर्धारित कर दी।
वैध नोटिस ही पूरी कार्यवाही की नींव
फैसले में अदालत ने कहा कि धारा 148 के तहत जारी वैध नोटिस ही पुनर्मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया का आधार होता है। यदि नोटिस किसी मृत व्यक्ति के नाम जारी किया गया है, तो उसके आधार पर शुरू की गई पूरी कार्यवाही प्रारंभ से ही शून्य (Void) मानी जाएगी। ऐसी त्रुटि को आयकर अधिनियम की धारा 292बी का सहारा लेकर भी दूर नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आयकर अधिनियम की धारा 159 के तहत कानूनी उत्तराधिकारी के खिलाफ कार्यवाही तभी जारी रखी जा सकती है, जब करदाता के जीवित रहते उसके खिलाफ वैध रूप से कार्यवाही शुरू की गई हो।
रिटर्न दाखिल करने पर भी टिप्पणी
अदालत ने यह भी माना कि पति की मृत्यु के बाद उनके नाम से आयकर रिटर्न दाखिल करना कानून के अनुरूप नहीं था और इसके दंडात्मक परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि कर कानूनों की सख्त व्याख्या के सिद्धांत के तहत विभाग को मृत व्यक्ति के नाम जारी अवैध नोटिस के आधार पर आगे की कार्रवाई जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इस फैसले को आयकर पुनर्मूल्यांकन मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मृत व्यक्ति के नाम जारी नोटिस के आधार पर पूरी कर कार्रवाई स्वतः अवैध हो जाती है।