
डिजिटल डेस्क। दक्षिण एशिया के कूटनीतिक गलियारों में एक बार फिर सीमा विवाद की गूंज सुनाई दे रही है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने वर्ष 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत और चीन द्वारा तैयार किए गए रूट पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई है। काठमांडू का दावा है कि जिस 'लिपुलेख दर्रे' का उपयोग इस पवित्र यात्रा के लिए किया जा रहा है, वह उसका संप्रभु हिस्सा है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत ने जून से अगस्त 2026 के बीच करीब 1,000 श्रद्धालुओं को सिक्किम के नाथू ला और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के माध्यम से मानसरोवर भेजने की तैयारी पूरी कर ली है।
नेपाल सरकार ने काठमांडू से जारी बयान में स्पष्ट किया कि लिपुलेख क्षेत्र में किसी भी प्रकार की धार्मिक, व्यापारिक या निर्माण गतिविधि के लिए उसकी पूर्व अनुमति अनिवार्य है। नेपाल ने न केवल भारत, बल्कि चीन को भी कटघरे में खड़ा किया है।
भारत और नेपाल के बीच इस विवाद का मुख्य केंद्र काली नदी का स्रोत है:
यह तनाव मई 2020 में उस समय चरम पर पहुंच गया था जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक एक लिंक रोड का उद्घाटन किया था। इसके जवाब में तत्कालीन ओली सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा जारी कर विवादित क्षेत्रों को अपनी सीमा के भीतर दिखाया था।
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वर्तमान में लिपुलेख मार्ग के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुके हैं। भारत इस मार्ग को सामरिक और धार्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है क्योंकि यह यात्रा के समय को काफी कम कर देता है। हालांकि, नेपाल के कड़े रुख ने इस त्रिपक्षीय (भारत-चीन-नेपाल) सीमा बिंदु पर कूटनीतिक जटिलता बढ़ा दी है।