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    कोरोना महामारी पर फिर छिड़ी बहस, तुलसी गबार्ड का दावा- वुहान लैब रिसर्च को मिली थी अमेरिकी फंडिंग

    अमेरिका की पूर्व राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (DNI) तुलसी गबार्ड ने कोरोना महामारी की उत्पत्ति को लेकर एक बार फिर नई बहस छेड़ दी है।

    By Digital DeskEdited By: manoj dubey
    Publish Date: Fri, 19 Jun 2026 05:07:17 PM (IST)Updated Date: Fri, 19 Jun 2026 05:07:17 PM (IST)
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    कोरोना महामारी पर फिर छिड़ी बहस, तुलसी गबार्ड का दावा- वुहान लैब रिसर्च को मिली थी अमेरिकी फंडिंग
    डॉ. एंथनी फौसी और तुलसी गबार्ड।

    HighLights

    1. इस पैसे का इस्तेमाल 'गैन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च के लिए किया
    2. डॉ. फौसी ने अपने पसंद के वैज्ञानिकों को सलाह देने के लिए चुना था
    3. अमेरिकी संसद के सामने झूठ बोलने का आरोप लगाया

    डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिका की पूर्व राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (DNI) तुलसी गबार्ड ने कोरोना महामारी की उत्पत्ति को लेकर एक बार फिर नई बहस छेड़ दी है। अपने कार्यकाल के अंतिम दिन जारी किए गए कुछ दस्तावेजों के आधार पर गबार्ड ने दावा किया है कि पूर्व अमेरिकी स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एंथनी फौसी ने चीन की वुहान लैब में वायरस संबंधी अनुसंधान के लिए अमेरिकी धन उपलब्ध कराया था।

    साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर सामने आए कुछ आकलनों को प्रभावित करने की भी कोशिश की गई। तुलसी गबार्ड का आरोप है कि डॉ. फौसी ने चीन की वुहान लैब को फंडिंग दी और कोरोना वायरस के लैब से लीक होने की थ्योरी को दबाने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को भी गुमराह किया।


    इस पैसे का इस्तेमाल 'गैन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च के लिए किया

    तुलसी गबार्ड के कार्यालय द्वारा जारी बयानों के अनुसार, डॉ. फौसी ने NIAID प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (WIV) को दिए थे। आरोप है कि इस पैसे का इस्तेमाल चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर खतरनाक 'गैन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च के लिए किया गया।

    कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वुहान लैब से कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला था। गबार्ड ने यह भी आरोप लगाया है कि फौसी ने बड़ी फार्मा कंपनियों के फायदे और ट्रिलियन डॉलर के यूनिवर्सल वैक्सीन बाजार को बढ़ावा देने के लिए इस रिसर्च को बढ़ावा दिया था।

    अपने पसंद के वैज्ञानिकों को चुना था

    दस्तावेजों के आधार पर यह भी दावा किया गया है कि डॉ. फौसी ने अपने पसंद के वैज्ञानिकों को खुफिया एजेंसियों को सलाह देने के लिए चुना था। इन्हीं वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट तैयार की थी कि कोरोना वायरस प्राकृतिक रूप से फैला है, लैब से नहीं।

    इसी रिपोर्ट को वैज्ञानिक सहमति बताकर सार्वजनिक किया गया, ताकि लैब-लीक वाली बात दबाई जा सके और फौसी का बचाव हो सके। जो एक्सपर्ट्स इससे असहमत थे, उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया।

    अमेरिकी संसद के सामने झूठ बोलने का आरोप लगाया

    तुलसी गबार्ड ने डॉ. फौसी पर अमेरिकी संसद के सामने झूठ बोलने का आरोप लगाया है। जून 2024 में संसद की सुनवाई के दौरान जब डॉ. फौसी से पूछा गया था कि क्या उन्होंने कोरोना या वायरस रिसर्च को लेकर कभी एफबीआई (FBI) या सीआईए (CIA) जैसी खुफिया एजेंसियों से बात की थी, तो उन्होंने इससे इन्कार करते हुए कहा था कि उनकी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं हुई है। लेकिन नए दस्तावेज उनके इस दावे को झूठा बताते हैं।

    नौकरी से निकालने और करियर बर्बाद करने की धमकी

    इसके अलावा गबार्ड के दफ्तर की तरफ से कहा गया है कि कई व्हिसलब्लोअर्स (भेद खोलने वाले अधिकारियों) ने गवाही दी है कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने डॉ. फौसी की थ्योरी को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें नौकरी से निकालने और करियर बर्बाद करने की धमकी दी गई।

    उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही डोनल्ड ट्रंप की खुफिया प्रमुख के पद से इस्तीफा देने वाली तुलसी गबार्ड ने कहा है कि सच को छिपाने के लिए जो तरीके अपनाए गए, वे सीधे तौर पर 'डीप स्टेट' (परदे के पीछे से सरकार चलाने वाले तंत्र) की साजिश जैसे हैं।

    यह भी पढ़ें- जिस वर्साय पैलेस में ट्रंप ने ईरान समझौते पर किए हस्ताक्षर वहीं 107 साल पहले बोए गए थे 'हिटलर के उदय के बीज'..!

    इस खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है

    गबार्ड ने कहा है कि सालों के झूठ, सेंसरशिप और सच को दबाने के बाद, अब अमेरिकी जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की हकदार है। फिलहाल इन गंभीर आरोपों पर डॉ. एंथनी फौसी या उनके प्रतिनिधियों की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि इस खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है।