
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में H-1B और L-1 वर्क वीजा की अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया को अधिक खर्चीला बनाने की तैयारी में है। होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) के नए रेगुलेटरी एजेंडे के मुताबिक, अब वीजा एक्सटेंशन की याचिकाओं पर भी 9-11 रिस्पॉन्स और बायोमेट्रिक एंट्री-एक्जिट फीस लागू करने का प्रस्ताव है।
मौजूदा व्यवस्था के तहत, 50 से अधिक कर्मचारियों वाली जिन कंपनियों में आधे से ज्यादा स्टाफ H-1B या L-1 धारक है, उन्हें नए आवेदनों या एम्प्लॉयर बदलने पर अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ता है। यह शुल्क H-1B के लिए 4,000 डॉलर और L-1 के लिए 4,500 डॉलर है। नए नियमों के स्पष्टीकरण के बाद यह फीस सभी एक्सटेंशन आवेदनों पर भी अनिवार्य हो जाएगी।
अमेरिकी टेक कंपनियों में काम करने वाले हजारों भारतीय कर्मचारियों और दिग्गज कंपनियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। H-1B वीजा धारकों को आमतौर पर शुरुआती तीन वर्षों के बाद एक्सटेंशन की आवश्यकता होती है। फैसले से गूगल, मेटा, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और टीसीएस जैसी बड़ी टेक व आईटी कंपनियां के इमिग्रेशन खर्च में भारी बढ़ोतरी होगी।
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USCIS के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत कुल H-1B याचिकाओं में से करीब 71% (2,91,542) मौजूदा रोजगार को आगे बढ़ाने के लिए थीं। इनमें से 77.6% (2,26,359) मंजूरियां भारतीय नागरिकों को मिलीं। इसके अलावा मल्टी नेशनल कंपनियों में प्रबंधकों और विशेषज्ञों के ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल होने वाले L-1 वीजा का खर्च बढ़ने से कॉर्पोरेट बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।